राजकमल जी की रचना दादरी से कासगंज

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हिन्दू मुस्लिम में देश को बाटने वाले बढ़ते माहौल में राष्ट्र बंधुत्व का संदेश देती मेरी यह रचना
*दादरी से कासगंज*

आज दुर्दशा है कैसी, हम विष नफरत का घोल रहे।
प्रीत की रीति हमारी है,
इस बात को हैं हम भूल रहे।।

हम भूल गए अब्दुल कलाम,और बापू की परिपाटी को।
अपने लहू से रंग रहे हम, अपने पावन माटी को।।

आज तिरंगे का अपने, हमने बटवारा कर डाला।
हरा दे दिया मुस्लिम को ,
हिन्दू को भगवा दे डाला।।

अमन शान्ती के खातिर, कितने थे फाँसी झूल गये।
दो रंगों में देश बाँट, हम श्वेत रंग को भूल गए।।

_(एक सवाल सभी भारतीयों से)_
तुम भारत माँ के बेटे हो, भारत मेरी भी माता है।
फिर हम दोनों भाई में, ये दंगे कौन कराता है।।

अब हममें अखलाक नहीं, माथे पर चंदन नहीं रहा।
दिल दहल गया था दादरी से, अब काशगंज भी सुलग रहा।।

अवॉर्ड वापसी करके वह, अब अपने घर मे लेटा है।
तड़फ रही ममता उसकी, जिस माँ ने खोया बेटा है।।

कौन सियासी चालें चलता, दिल्ली के दरबारों से।
लाशें जलने की बू आती है, राजनीति गलियारों से।।

_(सत्ता धारियों को एक सुझाव)_

आपस में हमें लड़ाने का, ये खेल घिनौना बन्द करो।
बिजली पानी सड़क सुरक्षा इसका कुछ प्रबन्ध करो।।

बहुत हुआ अब मंदिर मस्जिद, गाय औ गंगा रहने दो।
लाल हरे में मत बाटों, एक अमन तिरंगा रहने दो।।

समझ रही अब देश की जनता, दंगे सभी सियासी हैं।
हिन्दू मुस्लिम बाद में हैं,
हम पहले भारत वासी हैं।।

_(भाई चारे का एक संदेश)_
हर मानव की सेवा करना ही, उत्तम कर्म हमारा है।
राजकमल बस यही कहे कि मानव धर्म हमारा है।।

जाति धर्म से ऊपर उठकर, मैं बस प्रेम सिखाता हूँ।
भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात बताता हूँ।।

*राज कमल त्रिपाठी*

 

वीडियो ज़रूर देखे।

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