बांसी क्षेत्र में गन्ने की फसल में कीट लगने से किसान चिंतित
बांसी तहसील के दर्जनों गांवों में इस बार गन्ने की फसल पर कीटों का भारी प्रकोप देखने को मिल रहा है। किसानों के अनुसार पिछले कुछ हफ्तों में तना छेदक, पायरिला और सफेद मक्खी जैसे कीटों ने खेतों में तेजी से फैलकर पौधों को क्षतिग्रस्त कर दिया है। कई जगहों पर गन्ने की पत्तियां सूखने लगी हैं और तने में छेद के निशान साफ दिख रहे हैं, जिससे फसल की गुणवत्ता और वजन दोनों पर विपरीत असर पड़ रहा है। स्थानीय किसान संगठनों ने प्रशासन से जल्द हस्तक्षेप की मांग की है ताकि आगामी पेराई सत्र से पहले फसल को बचाया जा सके।
सिद्धार्थनगर जिले में गन्ना किसानों की आजीविका का प्रमुख साधन है और बांसी क्षेत्र इस उत्पादन का एक अहम केंद्र माना जाता है। जनपद में लगभग पचास हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ने की बुवाई होती है, जिसमें बांसी तहसील का योगदान उल्लेखनीय है। हर साल अक्टूबर से दिसंबर के बीच पेराई का काम शुरू होता है, लेकिन इस बार कीट प्रकोप के कारण किसानों को पहले से ही नुकसान झेलना पड़ रहा है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर समय रहते उचित प्रबंधन नहीं किया गया तो उत्पादन में 30 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है, जिससे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। मौसम में बदलाव और असमय बारिश ने भी कीटों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है।
कीट किन गांवों में फैला और कितना नुकसान
बांसी के किसानों के अनुसार मुख्य रूप से कुसुम्ही, पिपरा, मिठवल, बनकटा, पकरी, पथरा और रामपुर क्षेत्रों में कीट का सबसे ज्यादा असर देखा जा रहा है। इन गांवों में पायरिला नामक कीट ने सबसे पहले पत्तियों के नीचे हमला किया, जिससे रस चूसने वाले इस कीट ने पौधे को कमजोर कर दिया। इसके अलावा तना छेदक ने गन्ने के अंदर सुरंग बना दी है, जिससे तना सूखने लगता है और अंततः पूरा पौधा मर जाता है। कई खेतों में 50 प्रतिशत से अधिक पौधे प्रभावित बताए जा रहे हैं जबकि पिछले वर्ष इतने बड़े पैमाने पर नुकसान नहीं हुआ था।
स्थानीय किसान राम प्रसाद ने बताया कि उन्होंने इस बार चार एकड़ में गन्ना बोया था, लेकिन अब तीन एकड़ की फसल खराब होने की कगार पर है। उनका कहना है कि मजदूरों की लागत, बीज, खाद और सिंचाई पर हजारों रुपये खर्च कर चुके हैं, लेकिन कीट ने सब मेहनत पर पानी फेर दिया। ऐसी ही स्थिति आसपास के दर्जनों किसानों की है, जो अपनी फसल बचाने के लिए दिन-रात कीटनाशकों का छिड़काव कर रहे हैं। क्षेत्र में कई अन्य कृषि संबंधी समस्याएं भी लंबे समय से चल रही हैं, जिन पर प्रशासनिक ध्यान देने की जरूरत है, जैसा कि बांसी स्टेडियम निर्माण में घोटाले का आरोप, जांच की मांग जैसे मामलों में भी जनता की मांग रही है। किसानों का मानना है कि जब तक स्थानीय समस्याओं का समाधान नहीं होगा, क्षेत्र का विकास अधूरा रहेगा।
किसानों के सामने आर्थिक संकट
गन्ने की खेती में लागत पिछले कुछ वर्षों में काफी बढ़ गई है। बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अब कीटनाशक दवाओं पर होने वाला खर्च किसानों के लिए बोझ बनता जा रहा है। बांसी क्षेत्र के कई छोटे और सीमांत किसान ऋण लेकर खेती करते हैं और फसल बर्बाद होने की स्थिति में उन पर कर्ज का बोझ और बढ़ जाता है। कई किसानों ने बताया कि पिछले साल भी गन्ने का उचित मूल्य नहीं मिल पाया था और चीनी मिलों की ओर से भुगतान में काफी देरी हुई थी, जिससे परिवार का गुजारा चलाना मुश्किल हो गया था।
आर्थिक तंगी के कारण कुछ लोग वैकल्पिक आय के साधन तलाशने लगे हैं, हालांकि कई बार ये विकल्प भी जोखिम भरे होते हैं, जैसे कुछ लोग लाइव डीलर कैसीनो जैसे ऑनलाइन माध्यमों की ओर आकर्षित हो जाते हैं, जो अक्सर भारी नुकसान का कारण बनते हैं। कृषि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि ऐसे कदमों से बचकर किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ उठाना चाहिए और फसल विविधीकरण पर ध्यान देना चाहिए। इस क्षेत्र में सहकारी समितियों और कृषि विभाग को ऐसे किसानों तक पहुंचकर उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन देना चाहिए ताकि वे कर्ज के जाल में न फंसें और आत्महत्या जैसे गंभीर कदमों से बच सकें।
कृषि विभाग की सलाह और जागरूकता अभियान
जिला कृषि विभाग ने कीट प्रकोप की सूचना मिलते ही क्षेत्र में कृषि अधिकारियों की टीम भेजी है और किसानों को आवश्यक परामर्श दिया जा रहा है। उप कृषि निदेशक का कहना है कि पायरिला और तना छेदक दोनों ही कीटों पर नियंत्रण के लिए समय पर छिड़काव बहुत जरूरी है। विभाग की ओर से गांव-गांव कैंप लगाकर किसानों को जागरूक किया जा रहा है और कीटनाशकों के सही उपयोग की जानकारी दी जा रही है। किसानों को बताया जा रहा है कि छिड़काव सुबह या शाम के समय ही करें ताकि दवा का प्रभाव सही रहे।
किसानों को सलाह दी गई है कि वे प्रमाणित और शुद्ध कीटनाशकों का ही प्रयोग करें तथा स्थानीय दुकानदारों की सलाह पर अंधाधुंध दवा का छिड़काव न करें। कई बार नकली दवाओं के कारण कीट और फैलता है और फसल को अतिरिक्त नुकसान होता है। विभाग ने एक हेल्पलाइन नंबर भी जारी किया है, जिस पर किसान फसल संबंधी समस्याओं की जानकारी दे सकते हैं। साथ ही कुछ गांवों में कीट निगरानी के लिए फेरोमोन ट्रैप भी लगाए गए हैं, जिससे कीटों की संख्या पर नजर रखी जा सके और समय रहते कार्रवाई की जा सके। विभाग ने कृषि विज्ञान केंद्र से समन्वय कर किसानों के लिए प्रशिक्षण सत्र भी आयोजित किए हैं।
कीट नियंत्रण के उपाय और दवाओं की उपलब्धता
गन्ने में कीट नियंत्रण के लिए रासायनिक और जैविक दोनों तरीके अपनाए जा सकते हैं। रासायनिक उपचार में इमिडाक्लोप्रिड, क्लोरपायरीफॉस और थायमेथोक्साम जैसी दवाओं का छिड़काव प्रभावी माना जाता है। विशेषज्ञ बताते हैं कि तना छेदक के नियंत्रण के लिए कार्बोफ्यूरान का प्रयोग भी लाभदायक रहता है। हालांकि दवा की मात्रा और छिड़काव का समय बहुत महत्वपूर्ण है, अन्यथा इसका असर कम हो जाता है और कीट दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर लेते हैं।
जैविक नियंत्रण की बात करें तो ट्राइकोग्रामा परजीवी का उपयोग एक प्रभावी तरीका है, जो तना छेदक के अंडों को नष्ट कर देता है। इसके अलावा नीम आधारित जैव कीटनाशक भी काफी उपयोगी साबित हो रहे हैं, जो पर्यावरण के अनुकूल होते हैं और मिट्टी की उर्वरता को भी नुकसान नहीं पहुंचाते। बांसी की स्थानीय दवा दुकानों पर इन दवाओं की उपलब्धता सामान्य है, लेकिन कीमतें अधिक होने के कारण छोटे किसान इन्हें खरीदने में असमर्थ रहते हैं। विभाग की ओर से सब्सिडी पर कीटनाशक उपलब्ध कराने की मांग भी उठ रही है, ताकि अधिक से अधिक किसान इन दवाओं का समय पर प्रयोग कर सकें। साथ ही ट्रैप क्रॉपिंग के तरीके भी अपनाने की सलाह दी जा रही है, जिसमें गन्ने के खेत के किनारे अरहर या मक्का जैसी फसलें लगाई जाती हैं जो कीटों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं।
सरकारी योजनाएं और फसल बीमा की उम्मीद
किसानों को राहत देने के लिए कई केंद्र और राज्य सरकार की योजनाएं संचालित हैं, जिनमें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना प्रमुख है। इस योजना के तहत किसानों को फसल खराब होने पर बीमा कंपनी से मुआवजा मिलता है, लेकिन बांसी के कई किसानों का कहना है कि उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिल पाता। प्रीमियम राशि और जटिल प्रक्रिया के कारण कई किसान बीमा कराने से कतराते हैं, जिससे उन्हें फसल नुकसान की स्थिति में पूरी तरह अपने भाग्य पर निर्भर रहना पड़ता है। कई बार बीमा कंपनियां सर्वे में नुकसान कम आंकती हैं और किसानों को उचित मुआवजा नहीं मिलता।
स्थानीय किसान नेताओं ने जिला प्रशासन से मांग की है कि कीट प्रकोप से प्रभावित किसानों का सर्वे कराकर उचित मुआवजा दिया जाए। साथ ही चीनी मिलों से भी गन्ने की खरीद समय पर और उचित मूल्य पर सुनिश्चित कराने की मांग की गई है, क्योंकि कई मिलों पर किसानों का पिछले साल का बकाया भी अभी तक बाकी है। क्षेत्र के लोगों का कहना है कि सरकार को कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक नीतियां बनानी चाहिए ताकि किसानों को बार-बार संकट का सामना न करना पड़े। गन्ना किसानों की स्थिति में सुधार के लिए कृषि विभाग, चीनी मिल और प्रशासन के समन्वित प्रयास जरूरी हैं, तभी बांसी का गन्ना किसान आत्मनिर्भर और खुशहाल हो सकेगा। साथ ही प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना और गन्ने के वैकल्पिक उपयोग पर भी ध्यान देना आवश्यक है।