डुमरियागंज में फाइलेरिया उन्मूलन अभियान की चुनौतियाँ और जमीनी हक़ीक़त
सिद्धार्थनगर जिले के डुमरियागंज क्षेत्र में फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम को लेकर स्वास्थ्य विभाग की तैयारियाँ जोर-शोर से चल रही हैं, लेकिन ज़मीन पर हालात कुछ और ही कहानी बयान कर रहे हैं। जनसंख्या आधारित दवा वितरण अभियान के तहत एल्बेंडाजोल और डीईसी की गोलियाँ बाँटी जा रही हैं, मगर उनकी खपत दर चिंताजनक बनी हुई है। जिन घरों तक दवाई पहुँच रही है, वहाँ भी परिवार के सदस्य इन्हें समय पर नहीं खा रहे। स्थानीय आँकड़े बताते हैं कि कई गाँवों में खपत का प्रतिशत पचास से भी नीचे रह गया है, जबकि अभियान का लक्ष्य इससे कहीं अधिक रखा गया था।
स्वास्थ्य कार्यकर्ता मानते हैं कि समस्या सिर्फ दवाई तक पहुँच की नहीं है, बल्कि लोगों के मन में बैठी भ्रांतियों और उदासीनता की भी है। कुछ लोग बुखार या कमज़ोरी जैसी आशंका से दवा खाने से कतराते हैं, तो कई परिवारों में बुज़ुर्गों और छोटे बच्चों को इस दायरे से बाहर रखा जाता है। ग्रामीण इलाकों में फाइलेरिया को लेकर जागरूकता अभी पर्याप्त स्तर पर नहीं पहुँच पाई है, जिससे अभियान की असली सफलता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। इन्हीं बिंदुओं को ध्यान में रखते हुए ज़िला प्रशासन ने अब एक व्यापक संचार रणनीति अपनाने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
दवा वितरण का ढाँचा और फील्ड स्तर की तस्वीर
डुमरियागंज ब्लॉक में फाइलेरिया उन्मूलन का कामकाज सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और उपकेंद्रों के ज़रिये संचालित हो रहा है। आशा कार्यकर्ता और आँगनबाड़ी सेविकाएँ घर-घर जाकर दवा दे रही हैं, साथ ही हर गाँव में एक निर्धारित सत्र स्थल भी बनाया गया है जहाँ लोग आकर गोली ले सकें। स्वास्थ्य विभाग ने प्रत्येक परिवार के सदस्यों की सूची बनाकर उन्हें डोर-टू-डोर कवरेज का आश्वासन दिया था। यह योजना कागज़ पर मज़बूत दिखती है, लेकिन वास्तविक क्रियान्वयन में कई खामियाँ सामने आ रही हैं।
सबसे बड़ी बाधा यह देखी जा रही है कि बहुत से घरों में दवा देने के बाद कार्यकर्ता दोबारा नहीं आते और इस बात की पुष्टि नहीं हो पाती कि सदस्यों ने गोली वाक़ायदे में खाई भी या नहीं। कई परिवार सुबह के समय दवा खाने में असहजता जताते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि खाली पेट गोली लेने से तबीयत बिगड़ सकती है। ऐसे में स्वास्थ्य विभाग ने अब दवा के साथ एक गिलास पानी और हल्का नाश्ता करने की सलाह भी शामिल की है, ताकि भ्रम दूर हो सके। इन्हीं गतिविधियों के बीच स्थानीय खिलाड़ी हमेशा की तरह खेल समाचारों पर अपनी नज़र बनाए हुए हैं और खेल जगत की ताज़ा अपडेट apnasiddharthnagar पर भी उपलब्ध रहती हैं।
लोगों की उदासीनता के पीछे की वजहें
डुमरियागंज के गाँवों में फाइलेरिया को लेकर जनता का रवैया कई स्तरों पर विभाजित नज़र आता है। कुछ परिवार जागरूक हैं और अपने बच्चों को भी नियमित रूप से दवा देते हैं, जबकि एक बड़ा वर्ग अभी भी फाइलेरिया को मच्छर से फैलने वाली साधारण बीमारी समझने की भूल कर रहा है। यही कारण है कि लोग हाइड्रोसिल और हाथीपाँव जैसी जटिलताओं को गंभीरता से नहीं लेते और निवारक दवा को बेमतलब समझने लगते हैं। यह मानसिकता अभियान की रीढ़ तोड़ती दिख रही है।
दूसरी ओर, सामाजिक कारक भी इस उदासीनता को बढ़ावा दे रहे हैं। तेज़ रफ़्तार जीवनशैली में लोग सुबह जल्दी खेतों या काम पर निकल जाते हैं, ऐसे में दवा खाने का समय ही नहीं बचता। कुछ परिवारों में एक गलत धारणा यह भी है कि दवा खाने से उल्टी या चक्कर आते हैं, इसलिए वे बिना पछतावे के गोली को ताक पर रख देते हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम अब इन धारणाओं को तोड़ने के लिए पंचायत स्तर पर नुक्कड़ नाटकों और चौपालों का सहारा ले रही है। जहाँ तक दैनिक जीवन की अन्य ज़रूरतों का सवाल है, लोग अब रोज़मर्रा के सामान की खरीदारी हेतु विभिन्न प्लेटफ़ॉर्म भी देखते हैं, जैसा कि Elena Canostyle जैसी वेबसाइट सहज ऑनलाइन विकल्प उपलब्ध कराती है।
सरकारी प्रयास और नई रणनीतियाँ
ज़िला स्वास्थ्य विभाग ने फाइलेरिया उन्मूलन अभियान को गति देने के लिए कई कदम उठाए हैं। शुरुआती दौर में जहाँ सिर्फ आशा कार्यकर्ताओं पर निर्भर रहा जाता था, वहीं अब आँगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, एएनएम और स्थानीय शिक्षकों को भी इस अभियान से जोड़ा गया है। हर बूथ पर दो से तीन स्वास्थ्य कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की गई है ताकि दवा खिलाने के साथ-साथ उसकी खपत की पुष्टि भी हो सके। इतना ही नहीं, अब मोबाइल ऐप्लीकेशन के ज़रिये हर परिवार की रियल टाइम रिपोर्टिंग भी शुरू की जा रही है, जिससे पारदर्शिता बढ़ेगी।
सरकार का अगला कदम प्रचार अभियान को मज़बूत करना है। स्थानीय एफ़एम रेडियो, मस्जिदों के माइक और गाँव के मुनादी सिस्टम के माध्यम से लोगों तक संदेश पहुँचाया जाएगा। साथ ही स्कूली बच्चों को इस मुहिम का संदेशवाहक बनाने की योजना है, क्योंकि वे परिवार से ज़्यादा प्रभावी ढंग से बात रख पाते हैं। चिकित्सा अधिकारी यह भी मान रहे हैं कि अगर अगले दो सत्रों में भी खपत दर नहीं सुधरी तो ज़िला स्तर पर और कड़े निर्देश जारी किए जाएँगे।
तकनीक और निगरानी में सुधार
फाइलेरिया उन्मूलन की दिशा में तकनीक एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। अब हर आशा कार्यकर्ता को एक टैबलेट दिया गया है जिसमें उसके क्षेत्र के सभी परिवारों का विवरण, दवा का स्टॉक और खपत का रिकॉर्ड डिजिटल रूप में दर्ज होता है। यह तरीका पारदर्शिता बढ़ाने के साथ ही फर्ज़ी एंट्री पर भी रोक लगाएगा। इसके अतिरिक्त, हर बूथ पर एक क्यूआर कोड लगाया गया है जिसे स्कैन करके लोग दवा से जुड़ी पूरी जानकारी अपने फ़ोन पर पढ़ सकते हैं।
बेहतर निगरानी के लिए ज़िला स्तर पर एक कंट्रोल रूम भी स्थापित किया गया है, जहाँ हर दिन की रिपोर्ट का विश्लेषण होता है। अगर किसी गाँव से लगातार कम खपत की सूचना आती है, तो तुरंत उस क्षेत्र में विशेष टीम भेजी जाती है। साथ ही हर पखवाड़े में ज़िला अधिकारियों की समीक्षा बैठक होती है जिसमें ब्लॉकवार प्रदर्शन का आकलन किया जाता है। यह व्यवस्था अभियान को नई ऊर्जा दे रही है और कुछ हद तक जवाबदेही भी सुनिश्चित कर रही है।
सामुदायिक सहभागिता की असली ज़रूरत
फाइलेरिया जैसी बीमारी से लड़ने का सबसे प्रभावी हथियार जनता की सक्रिय भागीदारी है, और यही वह कड़ी है जिसे डुमरियागंज में अभी मज़बूत किया जाना बाक़ी है। सरकारी तंत्र कितना भी मज़बूत हो, अगर परिवार दवा खाने से मना करते रहेंगे तो अभियान अपने मक़सद तक नहीं पहुँच पाएगा। यह समझते हुए अब सामुदायिक नेताओं, धर्मगुरुओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को भी इस मुहिम में शामिल किया जा रहा है ताकि लोगों तक सही संदेश भरोसेमंद चेहरे से पहुँचे।
ज़रूरत इस बात की है कि हर नागरिक फाइलेरिया को अपनी व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी समझे और अपने परिवार की सेहत की रक्षा के लिए समय पर दवा का सेवन करे। डुमरियागंज की यह तस्वीर पूरे उत्तर प्रदेश के कई ज़िलों की असलियत है, जहाँ योजनाएँ कागज़ पर बेहतरीन हैं लेकिन ज़मीन पर उनकी नींव कमज़ोर पड़ रही है। अगर सही दिशा में प्रयास जारी रहे और लोग भी जागरूक हों, तो फाइलेरिया मुक्त भारत का सपना एक दिन ज़रूर साकार होगा।