डुमरियागंज तहसील की राजस्व वसूली में सुस्ती, अधिकारियों की भूमिका पर उठे सवाल
सिद्धार्थनगर जिले की डुमरियागंज तहसील में राजस्व वसूली की रफ्तार लगातार सुस्त पड़ी हुई है। जबकि बीते वित्तीय वर्ष में जिले की अन्य तहसीलों ने लक्ष्य के नजदीक पहुंचने की कोशिश दिखाई, वहीं डुमरियागंज का ग्राफ बार-बार नीचे की ओर खिसका है। राजस्व विभाग के आंकड़े बताते हैं कि यहां बकाया राशि का आंकड़ा करोड़ों में पहुंच चुका है, जिसके चलते जिला मुख्यालय से लेकर लखनऊ तक चिंता जताई जा रही है। Naugarha Thana Ksetra Mem Cori Ki Ghatana Pulisa Ne Janca Suru Ki 206023.
स्थानीय लोगों का कहना है कि तहसील के भीतर जमीनी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों की उदासीनता और कुछ प्रभावशाली लोगों की शह पर बड़े बकायेदारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं हो पा रही। राजस्व निरीक्षकों और लेखपालों की टीम भले ही नियमित रूप से गांवों का दौरा करती दिखे, लेकिन जब वसूली की बारी आती है तो फील्ड परिणाम शून्य के करीब रह जाते हैं। यही वजह है कि अब सवाल सीधे अधिकारियों की कार्यशैली पर उठने लगे हैं।
इस मुद्दे का एक और पहलू यह है कि पड़ोसी जिलों से आने वाले मामलों में भी डुमरियागंज तहसील का जिक्र हो रहा है। जब नौगढ़ थाना क्षेत्र में चोरी की घटना का पुलिस ने जांच शुरू की, उसके तार भी कुछ हद तक भूमि विवाद और राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ी से जुड़े दिखे, जिससे प्रशासनिक मशीनरी की समग्र कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान और गहरा हो गया।
तहसील का भौगोलिक और प्रशासनिक ढांचा
डुमरियागंज तहसील सिद्धार्थनगर जिले के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में बसी हुई है और इसकी सीमाएं बस्ती, संतकबीरनगर और बांसी तहसील से सटी हुई हैं। यहां लगभग दो सौ से अधिक राजस्व गांव आते हैं, जिनमें अधिकांश कृषि प्रधान हैं और आबादी का बड़ा हिस्सा छोटे-मझोले किसानों व खेतिहर मजदूरों का है। ऐसे इलाके में राजस्व वसूली का काम अनायास ही आसान नहीं होता, क्योंकि फसल चक्र और मौसम का सीधा असर किसानों की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है।
प्रशासनिक ढांचे की बात करें तो तहसील में एक तहसीलदार, कई राजस्व निरीक्षक और दर्जनों लेखपाल तैनात हैं। सैद्धांतिक रूप से यह संख्या पर्याप्त लगती है, लेकिन जमीन पर इन कर्मियों की उपस्थिति और सक्रियता हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कई पंचायतों में लेखपालों के रिक्त पद लंबे समय से खाली पड़े हैं और उनका काम अतिरिक्त प्रभार के तौर पर दूसरे लेखपालों को सौंपा गया है, जिससे जवाबदेही का अभाव साफ दिखता है।
स्थानीय निवासी बताते हैं कि तहसील मुख्यालय पर भीड़ अक्सर देखने को मिलती है, लेकिन फाइलों का निपटारा धीमी गति से होता है। कई बार लोग पूरे दिन बैठकर लौट जाते हैं। यही वह बुनियादी ढांचागत और प्रशासनिक कमजोरी है, जिसकी वजह से राजस्व वसूली जैसे समयबद्ध कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।
आंकड़ों में दिखता है लगातार पिछड़पन
राजस्व विभाग के आधिकारिक ब्योरों पर गौर करें तो पिछले दो वर्षों के दौरान डुमरियागंज तहसील राजस्व वसूली के मामले में जिले में सबसे निचले पायदान पर रही है। वित्तीय वर्ष की शुरुआत में तय लक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा वर्ष के अंतिम तिमाही में पूरा होता है, जबकि बांसी और शोहरतगढ़ जैसी तहसीलें काफी पहले ही अपना अधिकांश लक्ष्य हासिल कर लेती हैं।
भूमि राजस्व, जलकर, सिंचाई शुल्क और अन्य देय राशियों को मिलाकर तैयार किए गए आंकड़े बताते हैं कि यहां बकाया राशि का अनुपात जिले की औसत से कहीं अधिक है। कई बड़े भूस्वामियों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर लाखों रुपये का बकाया है, लेकिन उनके खिलाफ न तो कोई सख्त नोटिस जारी होता है और न ही कोई रिकवरी अभियान चलाया जाता है। छोटे किसानों से जुर्माने की तरह वसूली की जाती है, जबकि बड़े बकायेदारों को अनदेखा किया जाता है।
ये आंकड़े इसलिए भी चिंताजनक हैं, क्योंकि राजस्व वसूली का सीधा संबंध स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों की फंडिंग से होता है। जब तक तहसील अपना लक्ष्य पूरा नहीं करेगी, तब तक सड़क निर्माण, स्कूल भवन और स्वास्थ्य केंद्रों के विस्तार जैसे कामों में बजट की कमी खींचती रहेगी।
अधिकारियों की प्रतिक्रिया और बहाने
जब इस मुद्दे पर तहसील स्तर के अधिकारियों से बात की गई तो उनकी प्रतिक्रिया कई बार एक जैसी रही। एक वरिष्ठ राजस्व अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि कुछ इलाकों में कानून-व्यवस्था की स्थिति ठीक नहीं होने से वसूली में दिक्कत आती है। उनके अनुसार बार-बार की राजनीतिक हस्तक्षेप और दबाव के कारण कार्रवाई का माहौल नहीं बन पाता।
हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और ही बयान करती है। तहसील में तैनात कई लेखपाल काफी लंबे समय से एक ही क्षेत्र में जमे हुए हैं और उन पर स्थानीय राजनीतिक दलों या प्रभावशाली लोगों के साथ सांठगांठ के आरोप लगते रहे हैं। विभागीय स्तर पर इन अधिकारियों के तबादले और कार्यक्षेत्र में बदलाव की मांग कई बार उठी है, लेकिन अमल में यह कभी नहीं दिखा।
एक अन्य अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि डिजिटल रिकॉर्ड और ऑनलाइन भुगतान की सुविधा अब भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। पारदर्शिता की कमी के कारण कई लेन-देन कागज पर ही रह जाते हैं, जिसकी पड़ताल कर पाना आसान नहीं होता। अधिकारी चाहे जो भी बहाना दें, अंतिम जिम्मेदारी तो तहसील प्रशासन की ही बनती है।
राजनीतिक हस्तक्षेप और जनप्रतिनिधियों की बयानबाजी
स्थानीय स्तर पर इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। कुछ जनप्रतिनिधि सार्वजनिक मंचों से अधिकारियों की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि दूसरी ओर कुछ नेता अधिकारियों को बचाने की कोशिश में नजर आते हैं। इस दोहरे रवैये ने आम जनता के बीच भ्रम पैदा किया है और मामला और उलझता जा रहा है।
भाजपा और सपा क्षेत्र के विधायकों ने अलग-अलग मौकों पर इस विषय को उठाया है। एक विधायक का कहना है कि अगर राजस्व वसूली में पारदर्शिता लाई जाए और बड़े बकायेदारों पर कार्रवाई हो, तो तहसील की तस्वीर बदल सकती है। वहीं, दूसरे पक्ष का आरोप है कि जब भी कोई अधिकारी सख्ती करने की कोशिश करता है, राजनीतिक दबाव में उसका तबादला करवा दिया जाता है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसे मुद्दों का असर व्यापक होता है, क्योंकि यह सीधे आम आदमी की जेब से जुड़ा है। जब स्थानीय स्तर पर राजस्व ठीक से नहीं आता, तो विकास परियोजनाओं का बजट भी प्रभावित होता है और इसका खामियाजा अंततः उसी गांव के निवासी को भुगतना पड़ता है जहां से वसूली होनी चाहिए थी। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश समाचार की सुर्खियों में भी यह मुद्दा जगह पाने लगा है।
किसानों और छोटे व्यापारियों पर पड़ने वाला असर
राजस्व वसूली की सुस्ती का सबसे ज्यादा असर उन किसानों और छोटे व्यापारियों पर पड़ रहा है जो समय पर अपनी देय राशि जमा करते हैं। उनका कहना है कि जब बड़े लोग बिना किसी परिणाम के छोड़ दिए जाते हैं तो छोटों पर दबाव बढ़ता है और उनका उत्साह टूटता है। ऐसे में कई किसान अपनी जमीन को औने-पौने दाम पर बेचने पर मजबूर हो जाते हैं।
व्यापारिक वर्ग भी इस उदासीनता से परेशान है। दुकानदारों का कहना है कि उनके प्रतिष्ठानों पर नियमित जांच और कर निर्धारण होता है, जबकि बड़े गोदामों और फैक्ट्रियों को छूट दी जाती है। यह भेदभावपूर्ण रवैया न केवल कारोबारी माहौल को बिगाड़ता है, बल्कि सरकारी खजाने को भी नुकसान पहुंचाता है।
ग्रामीण इलाकों में कई किसान परिवार ऐसे हैं जिनकी पीढ़ियों से जमीन पर कब्जा है, लेकिन राजस्व रिकॉर्ड में गड़बड़ी के कारण उन्हें हर बार नई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जब तक पुराने रिकॉर्ड को डिजिटाइज करके ठीक नहीं किया जाता, तब तक वसूली का काम अधूरा ही रहेगा।
जिला प्रशासन की भूमिका और सुधार के प्रयास
सिद्धार्थनगर के जिलाधिकारी कार्यालय ने पिछले कुछ महीनों में राजस्व वसूली को लेकर कई बैठकें आयोजित की हैं। इन बैठकों में तहसीलदारों और राजस्व निरीक्षकों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि बकायेदारों की सूची तैयार कर समयबद्ध कार्रवाई की जाए। कुछ मामलों में नोटिस भी जारी किए गए हैं, लेकिन अमल अभी तक सीमित दिखता है।
जिला स्तर पर एक मॉनिटरिंग सेल भी बनाया गया है, जो हर पखवारे में तहसीलवार प्रगति की समीक्षा करता है। इस सेल ने कुछ ठोस सुझाव भी दिए हैं, जैसे ऑनलाइन भुगतान को अनिवार्य करना, लेखपालों की जियो-टैगिंग और कैंप लगाकर मौके पर वसूली करना। इनमें से कुछ सुझावों को आंशिक रूप से लागू किया गया है।
प्रशासन का कहना है कि बिना जन सहयोग के राजस्व वसूली का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल है। पंचायत स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने और स्वयं सहायता समूहों को भी इसमें जोड़ने की योजना है। हालांकि यह सब तभी सफल होगा जब ऊपर से नीचे तक जवाबदेही तय की जाए और भ्रष्टाचार के रास्ते बंद किए जाएं।
तुलनात्मक स्थिति और आगे की राह
डुमरियागंज तहसील की राजस्व वसूली की स्थिति को समझने के लिए अन्य तहसीलों से तुलना करना जरूरी है। नीचे दिए गए आंकड़े जिला राजस्व विभाग के हालिया ब्योरे पर आधारित हैं, जो मौजूदा वित्तीय वर्ष की स्थिति दिखाते हैं।
| तहसील | वार्षिक लक्ष्य (करोड़ में) | प्राप्त वसूली (करोड़ में) | वसूली प्रतिशत | बकाया राशि (करोड़ में) | प्रमुख समस्या |
|---|---|---|---|---|---|
| डुमरियागंज | 18.50 | 7.20 | 38.9% | 11.30 | बड़े बकायेदारों पर कार्रवाई का अभाव |
| बांसी | 22.00 | 17.80 | 80.9% | 4.20 | सामान्य प्रक्रियात्मक विलम्ब |
| शोहरतगढ़ | 15.75 | 12.40 | 78.7% | 3.35 | मानसून के कारण कुछ गांवों में रुकावट |
| इटवा | 14.20 | 11.05 | 77.8% | 3.15 | लेखपालों के रिक्त पद |
| नौगढ़ | 12.80 | 9.95 | 77.7% | 2.85 | सीमावर्ती क्षेत्रों में भूमि विवाद |
ऊपर की तालिका साफ बताती है कि डुमरियागंज की वसूली दर जिले की किसी भी अन्य तहसील से काफी कम है। बांसी जैसी तहसील जहां 80 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है, वहीं डुमरियागंज अभी भी चालीस प्रतिशत के आसपास संघर्ष कर रही है। इस अंतर को पाटने के लिए सिर्फ इच्छाशक्ति नहीं, बल्कि व्यवस्थागत सुधार और पारदर्शिता दोनों जरूरी हैं।
आगे की राह की बात करें तो सबसे पहले तहसील में डिजिटल राजस्व प्रणाली को पूरी तरह लागू करना होगा, ताकि हर लेन-देन का ऑनलाइन रिकॉर्ड रहे। दूसरा, बड़े बकायेदारों की सूची सार्वजनिक कर उन पर नियमित कार्रवाई हो। तीसरा, जिन लेखपालों और राजस्व निरीक्षकों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं, उनके खिलाफ विभागीय जांच तेज की जाए। इन उपायों के बिना डुमरियागंज तहसील की राजस्व वसूली की तस्वीर बदलना मुश्किल रहेगा, और तब तक यह मुद्दा हर बैठक में गूंजता रहेगा।