इटवा में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने में अफसरों की लापरवाही
सिद्धार्थनगर जिले के इटवा नगर पंचायत क्षेत्र में आम नागरिकों को सबसे अहम दस्तावेजों में गिने जाने वाले जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए काफी उलझनों का सामना करना पड़ रहा है। स्कूल में दाखिले से लेकर सरकारी योजनाओं के लाभ और संपत्ति के उत्तराधिकार तक, इन प्रमाण पत्रों का महत्व हर परिवार में बढ़ता जा रहा है, किंतु इटवा के कई घरों को यह कानूनी अधिकार अब भी सहज और पारदर्शी रूप से नहीं मिल पा रहा है। पिछले कई महीनों से स्थानीय निवासी कार्यालयों के चक्कर लगाकर थक चुके हैं और उनकी शिकायतें लगातार बढ़ती जा रही हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि नगर पंचायत कार्यालय और तहसील स्तर के रजिस्ट्रार दफ्तर में बैठे अधिकारी समय पर आवेदनों का निपटारा नहीं करते, जिसकी वजह से बच्चों के भविष्य के साथ-साथ बुजुर्गों की पेंशन और उत्तराधिकार से जुड़े काम भी लटक रहे हैं। कई मामलों में आवेदन पत्र महीनों तक पड़े रहते हैं और फाइलों पर अधिकारियों के हस्ताक्षर तक नहीं हो पाते। इस मुद्दे पर जब स्थानीय पत्रकारों ने जिम्मेदार अफसरों से बात करने का प्रयास किया तो अधिकांश ने चुप्पी साध ली या बात को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों की ओर मोड़ दिया।
पंजीकरण की प्रक्रिया कागज पर सरल, जमीन पर कठिन
इटवा में जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने की प्रक्रिया कागज पर काफी सरल दिखती है, लेकिन जमीन पर यह किसी लंबी परीक्षा से कम नहीं है। आवेदक को पहले नगर पंचायत या संबंधित ग्राम पंचायत कार्यालय में आवेदन जमा करना होता है, जिसके बाद तहसील स्तर के रजिस्ट्रार कार्यालय जाकर कागजातों की जांच करवानी पड़ती है। इस पूरी चरणबद्ध प्रक्रिया में कई बार आवेदक को तीन से चार बार एक ही कार्यालय का चक्कर लगाना पड़ता है, क्योंकि छोटी-छोटी कमियों को बताने में अधिकारी को काफी वक्त लग जाता है।
इसके अतिरिक्त, सरकार ने ऑनलाइन पंजीकरण की व्यवस्था भी चालू की है, लेकिन इटवा के अधिकांश निवासी डिजिटल माध्यम से अभ्यस्त नहीं हैं। जिन परिवारों के पास स्मार्टफोन या इंटरनेट की सुविधा नहीं है, उनके लिए जन सेवा केंद्र ही एकमात्र सहारा हैं, जहां एक-एक प्रमाण पत्र के बदले मनमानी राशि की मांग की शिकायतें भी बार-बार सामने आ रही हैं। इस पूरे लचर तंत्र की वजह से अधिकारी स्तर पर नागरिक सेवाएं ठीक से नहीं पहुंच पा रहीं हैं, और जनता का धैर्य अब जवाब देने लगा है।
अफसरों की अनदेखी के उजागर हो रहे मामले
हाल के हफ्तों में इटवा के कई गांवों से ऐसे उदाहरण मिले हैं जहां नवजात शिशु के जन्म के तीन से चार महीने बीत जाने के बाद भी परिवार को जन्म प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया है। इन्हीं में से एक मामला ग्राम पंचायत बेलौहा का है, जहां एक महिला ने बताया कि उसके बच्चे का नाम पंजीकरण के लिए आवेदन देने के बाद अधिकारी ने बार-बार कार्यालय बुलाया और अंततः तीन महीने बाद यह कहकर आवेदन पत्र गायब होने की सूचना दे दी कि अब नया आवेदन करना होगा। इसी तरह इटवा नगर पंचायत के एक बुजुर्ग की मृत्यु के बाद परिवार को मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने के लिए डेढ़ महीने तक इंतजार करना पड़ा, जिससे पेंशन और बैंक खाते से जुड़े जरूरी काम रुक गए।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता रमेश यादव का कहना है कि ये अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं, बल्कि एक पैटर्न है। जब भी कोई आवेदक अधिकारी से फोन पर संपर्क करता है तो कई बार फोन उठाया ही नहीं जाता या व्यस्त होने का जवाब मिलता है। कई बार तो नगर पंचायत कार्यालय में तैनात कर्मचारी मौजूद ही नहीं रहते। इसी उदासीनता ने अफसरों की जवाबदेही का गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र किसी परिवार की पहचान का कानूनी दस्तावेज होते हैं और इनके बिना सरकारी योजनाओं तक पहुंच बाधित हो जाती है। जिले से जुड़ी ऐसी खबरों का नियमित अद्यतन Apna Siddharthnagar पर प्रकाशित होता रहता है।
नागरिकों की दैनिक जिंदगी पर पड़ रहा असर
जन्म प्रमाण पत्र न मिलने का सबसे गहरा असर छोटे बच्चों पर पड़ रहा है, क्योंकि कई सरकारी स्कूलों में प्रवेश के लिए यह पहली शर्त होती है। इटवा के कई अभिभावकों ने बताया कि उनके बच्चों का दाखिला इसलिए रुका हुआ है क्योंकि जन्म प्रमाण पत्र अब तक जारी नहीं हुआ है। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है और परिवार पर मानसिक दबाव बढ़ रहा है। कुछ महिलाओं का कहना है कि अस्पताल से मिलने वाले जन्म प्रमाण पत्र को भी अधिकारी कभी-कभी पर्याप्त मानने से इनकार कर देते हैं, जिससे परिवार को दोहरी मार झेलनी पड़ती है।
वहीं दूसरी तरफ, मृत्यु प्रमाण पत्र के अभाव में परिवारों को पेंशन रुकने, बैंक खाते बंद होने और संपत्ति के हस्तांतरण में भारी बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है। कई विधवा महिलाओं ने शिकायत की है कि उनके पति की मृत्यु के कई महीने बाद भी मृत्यु प्रमाण पत्र न मिलने से उनकी पेंशन की किस्तें अटकी हुई हैं। ऐसे हालात में जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि परिवार के अस्तित्व और अधिकारों का प्रतीक बन जाता है। इस पूरे परिदृश्य में अफसरों द्वारा की जा रही अनदेखी सीधे तौर पर सामाजिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ खड़ी है और सरकार के उन वादों को भी कमजोर करती है, जो हर नागरिक को समय पर दस्तावेज देने की बात करते हैं।
जिम्मेदार विभागों की चुप्पी और जवाबदेही का अभाव
इटवा में जन्म और मृत्यु पंजीकरण का कामकाज मुख्य रूप से नगर पंचायत कार्यालय, तहसील स्तरीय रजिस्ट्रार और जिला अस्पताल के अधीनस्थ रिकॉर्ड रूम के अधिकारियों के अधीन होता है। इनमें से कई अधिकारियों पर पहले भी विभागीय जांच के दौर चल चुके हैं, फिर भी इनके खिलाफ ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है। स्थानीय मीडिया में बार-बार इन अधिकारियों के नाम और पद सामने आए हैं, लेकिन जिला प्रशासन ने इन्हें अब तक सिर्फ शाब्दिक चेतावनी देकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की है।
सूचना का अधिकार कानून के तहत मांगी गई जानकारी से भी यह पता चलता है कि इटवा में बकाया आवेदनों की संख्या किसी भी सरकारी आंकड़े से कहीं अधिक है। इसका अर्थ है कि अधिकारी न केवल आवेदनों का निपटारा नहीं कर रहे, बल्कि वास्तविक आंकड़ों को भी सार्वजनिक करने से बच रहे हैं। जब जिम्मेदार अधिकारी ही जवाबदेही से कतराते हैं तो आम नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए कहां जाए, यह एक गंभीर प्रश्न है। इसी प्रकार के क्षेत्रीय प्रशासनिक मुद्दों पर विस्तृत विश्लेषण क्षेत्रीय मीडिया प्लेटफार्म पर भी प्रकाशित होते रहते हैं।
प्रशासन की ओर से उठाए जा रहे कदम और उनकी सीमाएं
शिकायतों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जिलाधिकारी कार्यालय ने हाल ही में एक समीक्षा बैठक आयोजित की थी, जिसमें नगर पंचायत के अधिकारियों को बकाया आवेदनों का निपटारा एक सप्ताह के भीतर सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए। साथ ही एक विशेष शिविर आयोजित करने की घोषणा भी की गई, जहां लोग अपने नजदीकी केंद्र पर जाकर जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए आवेदन कर सकेंगे। हालांकि इन आदेशों का असर अब तक सीमित ही दिख रहा है, क्योंकि शिविरों की सही जानकारी आम जनता तक नहीं पहुंच पा रही है और पंचायत कार्यालयों में अब भी पुरानी ढिलाई बरती जा रही है।
कुछ स्वयंसेवी संस्थाओं ने भी इस विषय पर पहल की है और वे गांव-गांव जाकर लोगों को प्रमाण पत्र बनवाने के लिए जागरूक कर रही हैं। ये प्रयास सराहनीय हैं, किंतु अकेले पर्याप्त नहीं हैं। जब तक अधिकारी स्तर पर पारदर्शिता, समय-सीमा और जवाबदेही तय नहीं की जाती, तब तक इन समस्याओं का स्थायी समाधान मुश्किल है। जरूरी है कि स्थानीय जनप्रतिनिधि भी सक्रिय होकर अफसरों पर दबाव बनाएं, शिकायतों को सदन तक पहुंचाएं और जनता की आवाज को प्रशासनिक स्तर पर सुना जाए।
नागरिकों के लिए जरूरी मार्गदर्शन और अफसरों की जिम्मेदारी
इटवा में जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाने की समस्या का समाधान तभी संभव है जब अधिकारी अपनी जिम्मेदारी समझें और आम नागरिक भी अपने अधिकारों के प्रति सजग रहें। सरकार की ओर से तय समय-सीमा और अफसरों की जवाबदेही का अंतर इस पूरे मुद्दे की जड़ में है।
आवेदन करते समय रखें ये सावधानियां:
- संबंधित कार्यालय में आवेदन देने से पहले अस्पताल या नर्सिंग होम से मिली जन्म या मृत्यु की मूल रसीद अवश्य रखें
- आवेदन पत्र के साथ माता-पिता या मृत व्यक्ति के आधार कार्ड और निवास प्रमाण पत्र की छायाप्रति संलग्न करें
- आवेदन की पावती रसीद अधिकारी के हस्ताक्षर और कार्यालय की मुहर के साथ अनिवार्य रूप से प्राप्त करें
- अगर एक महीने से अधिक समय बीत जाए तो जिलाधिकारी कार्यालय या ऑनलाइन शिकायत पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं
अफसरों के खिलाफ शिकायत के प्रभावी तरीके:
- जनप्रतिनिधियों के माध्यम से विधानसभा क्षेत्र की स्तर पर मामला उठाएं
- सोशल मीडिया और स्थानीय अखबारों में शिकायत को प्रमाणित दस्तावेजों के साथ उजागर करें
- शासन के आईजीआर पोर्टल और सीएम हेल्पलाइन पर अधिकारी का नाम और पद विशेष रूप से दर्ज कराएं
- गांव की पंचायत बैठक में इस मुद्दे को आधिकारिक एजेंडे में शामिल कराएं
| सेवा का प्रकार | कानूनी समय-सीमा | इटवा में वास्तविक स्थिति | नागरिक पर प्रभाव |
|---|---|---|---|
| जन्म प्रमाण पत्र जारी करना | 7 दिन | 1 महीने से 3 महीने तक | स्कूल प्रवेश और सरकारी योजनाओं में देरी |
| मृत्यु प्रमाण पत्र जारी करना | 7 दिन | 1 महीने से 2 महीने तक | पेंशन और संपत्ति कार्यों में रुकावट |
| आवेदन की पावती रसीद | तत्काल | अक्सर अधूरी या मिलती ही नहीं | शिकायत दर्ज करने में कठिनाई |
| ऑनलाइन आवेदन की स्थिति अद्यतन | 24 घंटे में | अधिकांश मामलों में अद्यतन नहीं | आवेदक अनिश्चिता में रहता है |
ऊपर की तुलना से स्पष्ट होता है कि इटवा में जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने की प्रक्रिया की असली समस्या कागजी नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और अफसरों की निजी जवाबदेही की कमी है। यदि जिला प्रशासन एक निश्चित समय-सीमा में बकाया आवेदनों का पूरा डेटा सार्वजनिक करे, अधिकारियों का मासिक प्रदर्शन मूल्यांकन करे और नागरिकों की शिकायतों पर सख्त कार्रवाई करे, तो इस समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है। सरकारी सेवाओं का असली उद्देश्य तभी पूरा होगा जब हर नागरिक को समय, पारदर्शी और गरिमापूर्ण ढंग से उसका संवैधानिक अधिकार मिले।