इटवा में मोबाइल टावर विकिरण की शिकायत, नगर पंचायत से जांच की मांग
इटवा नगर पंचायत क्षेत्र में पिछले कुछ महीनों से मोबाइल टावर लगाने के खिलाफ निवासियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। आवासीय मोहल्लों के बीच ऊंचे टावरों और उनसे निकलने वाले विकिरण को लेकर स्थानीय लोगों ने कई बार शिकायत दर्ज कराई है, पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है। इस मुद्दे पर व्यापारी वर्ग और महिलाओं ने भी गहरी चिंता जताई है। Itava Mem Bijali Ki Samasya Se Paresana Vyapari Bijali Vibhaga Ko Jnapana 252661.
मोहल्लेवासियों का कहना है कि टावर के कारण मवेशियों के दूध उत्पादन में कमी, नींद न आने की समस्या और बच्चों में सिरदर्द जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं। सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा गर्म है और लोग लगातार अपनी बात रख रहे हैं। ऐसे में निवासियों ने अब नगर पंचायत से औपचारिक जांच कराने और आवश्यक कदम उठाने की मांग की है।
निवासियों की शिकायतों का स्वरूप और मोहल्लों का हाल
इटवा के वार्ड संख्या पांच, नौ और ग्यारह में टावर लगे हुए हैं और यहां रहने वाले लोगों का कहना है कि वे पिछले दो साल से अधिक समय से इस समस्या से जूझ रहे हैं। गलियों में तारों का जाल, पास के ट्रांसफार्मर से निकलने वाली हल्की गुनगुनाहट और टावर की लाल बत्ती रात के अंधेरे में घरों के ठीक ऊपर झिलमिलाती रहती है। लोग बताते हैं कि इससे नींद में बाधा होती है और बुजुर्गों को अक्सर सिर चकराने की शिकायत रहती है।
महिलाओं ने बताया कि वे अपने बच्चों को लेकर विशेष रूप से चिंतित हैं क्योंकि स्कूल जाने की उम्र के बच्चे इस विकिरण के संपर्क में सबसे अधिक समय बिताते हैं। कई परिवारों ने अपनी छतों पर पुरानी चादर और तिरपाल बिछाकर कुछ हद तक राहत पाने की कोशिश की है, लेकिन इससे कोई स्थायी समाधान नहीं निकला है। स्थानीय सफाई कर्मचारियों और रिक्शा चालकों का कहना है कि जिस मोहल्ले में टावर है, वहां आम दिनों में भी लोगों की तबीयत ठीक नहीं रहती।
इस बीच कुछ पुराने निवासी याद करते हैं कि जब ये टावर नहीं थे तब उनके बच्चे आज से अधिक सक्रिय थे और मवेशी भी स्वस्थ दिखते थे। ये दावे वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हैं, लेकिन लोगों के मन में बैठ गए हैं और इसी के चलते प्रशासन से मांग लगातार तेज हो रही है। ऐसे ही माहौल में इलाके में अन्य बुनियादी समस्याएं भी एक साथ उभर रही हैं।
नगर पंचायत की भूमिका और अधिकार क्षेत्र
नगर पंचायत के अध्यक्ष ने कहा है कि मोबाइल टावर की स्थापना का मूल अनुमति पत्र दूरसंचार विभाग और जिला प्रशासन से जारी होता है, जबकि नगर पंचायत की भूमिका केवल भवन निर्माण और स्थानीय निगरानी तक सीमित रहती है। इसलिए कई बार शिकायत मिलने पर भी पंचायत स्तर पर पूर्ण कार्रवाई संभव नहीं हो पाती है। स्थानीय पार्षदों का कहना है कि वे इस मुद्दे को विधानसभा क्षेत्र के प्रतिनिधियों तक पहुंचाएंगे ताकि एक स्पष्ट नीति बनाई जा सके।
नगर पंचायत की ओर से एक संयुक्त निरीक्षण टीम गठित करने की योजना है जिसमें स्वास्थ्य विभाग, लोक निर्माण और दूरसंचार विभाग के कर्मचारी शामिल होंगे। यह टीम टावरों की ऊंचाई, तारों की स्थिति और आसपास के मकानों से दूरी की माप लेगी। रिपोर्ट तैयार होने के बाद इसे जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा। अभी यह प्रक्रिया कागजों पर ही है और व्यावहारिक रूप से कब शुरू होगी यह तय नहीं हो सका है। इसी प्रकार की शिकायतों की पृष्ठभूमि में बिजली समस्या की रिपोर्ट भी देखी जा सकती है, जहां स्थानीय एजेंसियों की सीमित भूमिका का मुद्दा उठा था।
मोहल्लेवासियों की एक मांग यह भी है कि जिन टावरों को आवासीय क्षेत्र में स्थापित किया गया है, उन्हें शहर के बाहरी इलाके में स्थानांतरित किया जाए। पंचायत सदस्यों का कहना है कि इसके लिए कंपनियों से वार्ता करनी होगी क्योंकि स्थानांतरण से पहले वैकल्पिक स्थल चयन, नींव निर्माण और फिर से कनेक्शन जैसी कई प्रक्रियाएं आती हैं। ऐसे में समाधान में समय लगना स्वाभाविक है, पर जनता का धैर्य अब सीमा पर पहुंच रहा है।
विकिरण मानकों का तकनीकी और कानूनी पक्ष
भारत में मोबाइल टावरों से निकलने वाले विकिरण के लिए दूरसंचार विभाग ने 2008 में ईएमएफ दिशानिर्देश जारी किए थे जिन्हें 2012 में और सख्त किया गया। इन मानकों के अनुसार 900 मेगाहर्ट्ज बैंड के लिए अधिकतम ट्रांसमिशन पावर 43 डीबीएम और 1800 मेगाहर्ट्ज बैंड के लिए 40 डीबीएम तय की गई है। स्थानीय स्तर पर यह जांच करने के लिए न तो पर्याप्त उपकरण हैं और न ही प्रशिक्षित कर्मचारी, इसलिए अधिकांश शिकायतें बिना किसी ठोस प्रमाण के दर्ज रह जाती हैं।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अपने अध्ययनों में कहा है कि जब तक मानकों का उल्लंघन सिद्ध न हो तब तक टावर हटाने का आदेश देना कठिन होता है। दूरसंचार कंपनियों का अपना पक्ष है कि वे पूरी तरह नियमों का पालन करती हैं और सभी टावरों पर ऑटोमैटिक पावर कंट्रोल सिस्टम लगा होता है। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता इस दावे को सिरे से खारिज करते हैं और कहते हैं कि जमीनी स्तर पर स्थिति बिल्कुल अलग है।
| एजेंसी | कार्यक्षेत्र | संबंधित कानून या नियम |
|---|---|---|
| नगर पंचायत इटवा | स्थानीय अनुमति और शिकायत सुनवाई | राज्य नगर पालिका अधिनियम |
| दूरसंचार विभाग | राष्ट्रीय ईएमएफ मानक निर्धारण | भारतीय दूरभाष अधिनियम |
| टीईआरएम सेल | तकनीकी शिकायतों का निपटारा | दूरसंचार विनियमन |
| राज्य प्रदूषण बोर्ड | पर्यावरण निगरानी | पर्यावरण संरक्षण अधिनियम |
| जिला प्रशासन | समन्वय और सुरक्षा पहलू | आपदा प्रबंधन अधिनियम |
इस तुलना से यह स्पष्ट होता है कि नगर पंचायत अकेले इस मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं निकाल सकती और केंद्रीय एजेंसियों की भागीदारी अनिवार्य है। इसीलिए मांग यह भी उठ रही है कि नगर पंचायत की अगुवाई में एक संयुक्त जांच दल गठित हो जो हर स्तर पर जवाबदेही तय कर सके। कई पार्षद इसके लिए स्थानीय जनसुनवाई भी आयोजित करना चाहते हैं ताकि पीड़ित परिवार अपनी बात खुलकर रख सकें।
स्वास्थ्य प्रभाव और विशेषज्ञों की राय
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अब तक मोबाइल टावर के विकिरण को मानव स्वास्थ्य के लिए सिद्ध रूप से हानिकारक नहीं माना है, लेकिन कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में लंबे समय तक संपर्क में रहने पर सिरदर्द, नींद की समस्या और हार्मोनल असंतुलन जैसी दिक्कतों का जिक्र मिलता है। भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने 2014 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें आवासीय क्षेत्रों के नजदीक टावर लगाने पर पुनर्विचार की सिफारिश की गई थी। ऐसे में निवासियों की चिंता को पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता।
इटवा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के एक वरिष्ठ चिकित्सक ने बताया कि पिछले एक साल में माइग्रेन और अनिद्रा की शिकायत लेकर आने वाले मरीजों की संख्या में हल्की बढ़ोतरी जरूर हुई है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह केवल टावर के कारण है यह कहना कठिन है, लेकिन पर्यावरणीय कारकों की भूमिका को नकारा भी नहीं जा सकता। गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों को विशेष रूप से अतिरिक्त सतर्कता बरतने की सलाह दी जाती है।
मोबाइल फोन अब केवल बातचीत का साधन नहीं रहा, बल्कि इससे जुड़ी डिजिटल गेमिंग सेवाएं, ऑनलाइन मनोरंजन और डिजिटल कारोबार तक सब कुछ चलते हैं। ऐसे में लोगों का फोन पर बिताया समय भी बढ़ा है और टावर की भूमिका अब इससे भी आगे तक जाती है। इसी कारण यह तय कर पाना और कठिन हो जाता है कि स्वास्थ्य समस्याएं टावर से हैं या फोन के अत्यधिक उपयोग से। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ने अगले तीन महीने में एक जागरूकता अभियान चलाने का निर्णय लिया है ताकि लोग दोनों पहलुओं से सतर्क रहें।
सिद्धार्थनगर जिले के अन्य कस्बों से तुलना
सिद्धार्थनगर जिले के अन्य कस्बों जैसे बांसी, डुमरियागंज, नौगढ़ और शोहरतगढ़ में भी मोबाइल टावर से जुड़ी शिकायतें कभी कभी सुनने को मिलती हैं, लेकिन इटवा जैसा सघन आंदोलन अभी कहीं देखने को नहीं मिला है। बांसी में अधिकांश टावर मुख्य बाजार के बाहर खेतों में स्थापित हैं, जिससे आवासीय क्षेत्र से उनकी दूरी अपेक्षाकृत अधिक है। शोहरतगढ़ में कुछ वर्ष पूर्व एक टावर पर आग लगने की घटना हुई थी, जिसके बाद वहां अनुरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।
डुमरियागंज में टावर संचालकों ने स्थानीय लोगों को रोजगार और क्षेत्र के विकास के लिए सहयोग की पेशकश की थी, जिससे विरोध कुछ कम रहा है। इसके विपरीत इटवा में कंपनियों की ओर से कोई सामुदायिक कार्यक्रम सामने नहीं आया है, इसलिए लोगों का गुस्सा और अधिक है। कुछ स्थानीय लोगों का कहना है कि विकास के नाम पर टावर लगाना जायज है, पर इसकी पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और नियमित होनी चाहिए।
प्रशासन से अपेक्षाएं और आगे की राह
जिला प्रशासन ने अब तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है, हालांकि अधिकारियों ने नगर पंचायत की ओर से प्रस्ताव आने पर विचार करने की बात कही है। उम्मीद की जा रही है कि जुलाई के अंत तक एक उच्चस्तरीय बैठक आयोजित की जाएगी जिसमें दूरसंचार कंपनियों के प्रतिनिधि, स्वास्थ्य विभाग और स्थानीय जनप्रतिनिधि शामिल होंगे। इस बैठक में टावरों के स्थानांतरण की समयसीमा और निगरानी तंत्र पर चर्चा होने की संभावना है।
मोहल्लेवासी चाहते हैं कि रात के समय टावर की रोशनी बंद की जाए और बिजली के तार सही ढंग से अर्थिंग किए जाएं, इससे आसपास के लोगों को हल्की झुनझुनी और गर्मी से कुछ राहत मिल सके। साथ ही नए टावर लगाने से पहले सार्वजनिक सुनवाई का प्रावधान हो ताकि स्थानीय लोगों की राय को प्रशासन गंभीरता से ले। इन सुझावों को लेकर सामाजिक संगठन भी अब सक्रिय हो गए हैं और वे आगामी दिनों में ज्ञापन देने की योजना बना रहे हैं।
मोबाइल टावर अब केवल बातचीत का साधन नहीं रहे, बल्कि इनसे जुड़े डिजिटल प्लेटफार्म, ऑनलाइन कारोबार और सरकारी सेवाओं का लाभ भी लिया जा रहा है। ऐसे में टावर हटाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, पर उनके संचालन को जवाबदेह और मानवीय बनाना अब समय की जरूरत है। इस मुद्दे पर अपना सिद्धार्थनगर पोर्टल पर भी नियमित रूप से अपडेट प्रकाशित किए जा रहे हैं, ताकि पाठकों को हर चरण की जानकारी मिलती रहे।