सिद्धार्थनगर में धान खरीद केंद्रों पर किसानों की लंबी कतारें, उठान में भारी देरी
सिद्धार्थनगर जिले के विभिन्न धान खरीद केंद्रों पर इन दिनों किसानों का जमावड़ा देखने को मिल रहा है। कटाई का मौसम पूरी तरह से शुरू हो चुका है और खेतों से मंडियों तक फसल पहुंचने लगी है, लेकिन खरीद प्रक्रिया की धीमी रफ्तार ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। बांसी, डुमरियागंज, इटवा, नौगढ़ और सोहरतगढ़ तहसील क्षेत्रों के किसान ट्रैक्टर-ट्रॉलियों और बैलगाड़ियों से अपनी उपज लेकर पहुंच रहे हैं, मगर तौल और खरीद के बाद उठान नहीं हो पा रहा है। मंडी परिसर में ट्रैक्टरों की कतारें अब आम दृश्य बन चुकी हैं और किसान रात गुजार कर भी अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं।
किसान अपनी बारी का इंतजार कर रहे हैं और खरीदी गई धान की बोरियां केंद्र पर ही पड़ी हुई हैं। एजेंसियों द्वारा उठान समय पर न किए जाने से केंद्र संचालकों के सामने जगह की समस्या खड़ी हो गई है और नई आवक को रखने में दिक्कत हो रही है। इससे पूरी खरीद व्यवस्था पर बोझ बढ़ता जा रहा है और किसानों के सामने अपनी उपज बेचने की चुनौती खड़ी हो गई है। स्थानीय मंडी समिति और प्रशासन के बीच इस मुद्दे पर लगातार समन्वय की कमी देखी जा रही है, जिसका खामियाजा अंततः किसानों को ही भुगतना पड़ रहा है।
किसानों की कतारें और इंतजार की मार
जिले के सबसे बड़े धान खरीद केंद्रों में शामिल बांसी और डुमरियागंज मंडी परिसर में सुबह से ही किसानों की कतारें लगना शुरू हो जाती हैं। कई किसान तो रात में ही अपना सामान लेकर पहुंच जाते हैं ताकि पहले नंबर पर रहकर जल्दी तौल करा सकें। ऐसे में महीनों की मेहनत के बाद मंडी पहुंचे किसानों को लंबे समय तक धूप और ठंड में खड़ा रहना पड़ रहा है। कुछ किसान परिवार के सदस्यों के साथ आते हैं ताकि एक तरफ से तौल की प्रक्रिया पूरी हो सके और दूसरी तरफ सामान की सुरक्षा का भी ध्यान रखा जा सके।
स्थानीय किसानों के अनुसार पंजीकरण के बाद टोकन मिलने में ही कई दिन का समय लग रहा है। एक बार टोकन मिलने पर तौल की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, लेकिन उसके बाद फसल का उठान न होने से भुगतान में भी अनिश्चितता बनी रहती है। किसान रामप्रवेश, रामनरेश और फूलचंद जैसे तमाम लोग बताते हैं कि उन्हें पिछले कई सीजन में भी ऐसी ही समस्याओं का सामना करना पड़ा है और अबकी बार स्थिति पहले से भी ज्यादा खराब नजर आ रही है। बहुत से किसानों ने बताया कि उनकी पूरी उपज एक ही बार में नहीं बिक पा रही है, जिससे उन्हें कई बार मंडी आना पड़ रहा है।
बोरे में भरा धान केंद्र पर खुले में पड़ा रहता है, जिससे बारिश होने पर नमी का खतरा बढ़ जाता है। किसानों को डर सता रहा है कि अगर समय पर उठान नहीं हुआ तो उनकी फसल की गुणवत्ता प्रभावित होगी और उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा। कुछ किसान तो मजबूरी में निजी व्यापारियों को कम दाम पर अपनी उपज बेचने को मजबूर हो रहे हैं, क्योंकि सरकारी खरीद केंद्रों पर लंबा इंतजार उनके लिए संभव नहीं हो पा रहा। ऐसे में किसानों की साल भर की मेहनत और लागत दोनों पर पानी फिरता नजर आ रहा है।
खरीद केंद्रों पर व्यवस्था और प्रशासन की भूमिका
जिले में धान खरीद का काम पीसीएफ, एफसीआई, यूपी एग्रो और कुछ सहकारी समितियों के माध्यम से किया जा रहा है। सरकार ने इस बार न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद का लक्ष्य तय किया है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि केंद्रों पर कर्मचारियों की कमी और उठान के लिए पर्याप्त वाहनों की व्यवस्था नहीं हो पाई है। कई केंद्रों पर तौल मशीनें ठीक से काम नहीं कर रही हैं, जिससे समय और बढ़ रहा है। किसानों को कभी-कभी एक ही तौल के लिए दो-तीन बार मशीन के सामने खड़ा होना पड़ता है।
जिला प्रशासन ने खरीद केंद्रों पर किसानों की सुविधा के लिए पेयजल, शेड और बैठने की व्यवस्था करने के निर्देश दिए हैं। बांसी, इटवा और नौगढ़ के कुछ केंद्रों पर तिरपाल की छाया में किसान बैठने को मजबूर हैं। खाद्य विपणन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उठान के लिए ट्रकों और मजदूरों की व्यवस्था की जा रही है, लेकिन जब तक यह व्यवस्था पूरी तरह से लागू नहीं होती, किसानों की मुश्किलें कम नहीं होंगी। केंद्र संचालकों का कहना है कि उठान की जिम्मेदारी ट्रांसपोर्ट कंपनियों की है और उनके पास पर्याप्त वाहन नहीं पहुंच रहे हैं।
जिलाधिकारी ने हाल ही में खरीद केंद्रों का निरीक्षण किया और अधिकारियों को उठान में तेजी लाने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि किसी भी किसान को अपनी उपज बेचने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए और समय पर भुगतान सुनिश्चित किया जाएगा। हालांकि, किसान संगठनों का कहना है कि निरीक्षण के बाद भी स्थिति में कोई खास सुधार नहीं दिख रहा है। प्रशासन की ओर से दिए गए आश्वासन और जमीनी हकीकत में जमीन-आसमान का फासला दिख रहा है।
उठान में देरी से पैदा हुआ संकट
धान की खरीद तो हो रही है, मगर उठान न होने से केंद्रों पर जगह का संकट गहराने लगा है। एक केंद्र पर क्षमता से दोगुनी बोरियां पड़ी हुई हैं और नई आवक को रखने के लिए जगह नहीं बची है। ऐसे में केंद्र प्रभारी किसानों को अगले दिन या फिर कुछ दिन बाद आने को कह रहे हैं, जिससे किसानों को बार-बार मंडी का चक्कर लगाना पड़ रहा है। कई केंद्रों पर किसानों ने अपनी उपज खुले आसमान के नीचे रखी हुई है, जिससे बारिश और ओस से फसल खराब होने का खतरा बढ़ गया है।
उठान में देरी का असर सीधे किसानों की जेब पर पड़ रहा है। बोरियों को दोबारा उठाने-रखने, परिवहन और मजदूरी पर अतिरिक्त खर्च आ रहा है। कई किसानों ने बताया कि उन्हें अपने ट्रैक्टर का डीजल और मजदूरों का पैसा भी चुकाना पड़ रहा है, जबकि उनकी उपज का भुगतान अभी तक उनके खाते में नहीं आया है। भुगतान में देरी से किसान अपनी अगली फसल की तैयारी और परिवार के खर्चे भी नहीं उठा पा रहे हैं। कुछ किसानों ने बताया कि उन्हें बच्चों की स्कूल फीस और घरेलू जरूरतों के लिए साहूकारों से कर्ज लेना पड़ रहा है।
स्थानीय व्यापारियों का कहना है कि जब तक सरकारी खरीद केंद्रों से धान का उठान नहीं होगा, तब तक निजी बाजार में भी कीमतों पर दबाव बना रहेगा। कुछ व्यापारी किसानों की मजबूरी का फायदा उठाकर एमएसपी से कम पर खरीद करने की कोशिश कर रहे हैं। इससे बिचौलियों को फायदा हो रहा है और असली किसानों को नुकसान झेलना पड़ रहा है। कुल मिलाकर देरी का असर पूरी कृषि आपूर्ति श्रृंखला पर पड़ रहा है, जिसका दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे।
किसान संगठनों की आवाज और सरकारी दावे
भारतीय किसान यूनियन और अन्य किसान संगठनों ने मांग की है कि जिले के सभी धान खरीद केंद्रों पर तत्काल उठान की व्यवस्था की जाए। उनका कहना है कि सरकार हर साल लाखों टन धान खरीदने का दावा करती है, लेकिन जमीन पर किसानों को भटकना पड़ता है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द ही समस्या का समाधान नहीं हुआ तो वे जिला मुख्यालय पर धरना-प्रदर्शन करेंगे। किसान नेताओं ने मुख्यमंत्री और प्रदेश के कृषि मंत्री से इस मामले में हस्तक्षेप की मांग की है।
किसान नेता राधेश्याम यादव और अजय सिंह का कहना है कि धान खरीद के नियमों के अनुसार खरीद के 72 घंटे के भीतर उठान हो जाना चाहिए, लेकिन यहां तीन से चार दिन भी बीत जाने पर बोरियां केंद्र पर पड़ी रहती हैं। उन्होंने बताया कि इस बार बारिश का मौसम लंबा रहा है और नमी की वजह से धान का वजन बढ़ने से किसानों को नुकसान हो रहा है। साथ ही, तौल में कटौती की शिकायतें भी सामने आ रही हैं, जिससे किसानों को प्रति क्विंटल कई किलो का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
दूसरी तरफ, कृषि विभाग और खाद्य विपणन विभाग के अधिकारी दावा कर रहे हैं कि जिले में अब तक हजारों क्विंटल धान की खरीद की जा चुकी है और उठान की प्रक्रिया भी तेजी से चल रही है। अधिकारियों ने बताया कि कुछ केंद्रों पर निजी ट्रांसपोर्टरों की मदद से उठान कराया जा रहा है, जबकि कुछ जगहों पर सरकारी वाहनों का इंतजार किया जा रहा है। विभाग का कहना है कि अगले एक सप्ताह में उठान की रफ्तार और तेज होगी और किसानों को जल्द ही राहत मिलेगी।
आगे की राह और जिले की कृषि तस्वीर
सिद्धार्थनगर जिले की कृषि अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा धान की खेती पर निर्भर है। यहां के किसान मुख्य रूप से बासमती और सामान्य किस्मों के धान की पैदावार करते हैं और उत्तर प्रदेश सरकार की खरीद नीति सीधे उनकी आय को प्रभावित करती है। अगर खरीद और उठान की व्यवस्था समय पर दुरुस्त नहीं की गई तो आने वाले सीजन में किसान धान की खेती से मुंह मोड़ सकते हैं, जिससे कृषि विविधता पर असर पड़ेगा। कुछ किसानों ने संकेत दिए हैं कि वे अगले सीजन में गेहूं और दलहन की खेती की तरफ रुख कर सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रों पर डिजिटल तौल मशीन, सीसीटीवी कैमरे और ऑनलाइन भुगतान जैसी व्यवस्था को और मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही, किसानों को अपनी उपज की गुणवत्ता के अनुसार सही दाम मिले, इसके लिए पारदर्शिता बढ़ानी होगी। जिले में कुछ जगहों पर किसानों को अपनी उपज का सही दाम न मिलने की शिकायतें भी सामने आई हैं, जिन पर प्रशासन को ध्यान देना होगा। फसल बीमा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड जैसी योजनाओं का लाभ भी किसानों को समय पर मिलना चाहिए।
इन सबके बीच किसानों का इंतजार अभी जारी है और मंडियों में उनकी कतारें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। प्रशासन को चाहिए कि वह उठान की व्यवस्था में तेजी लाए, भुगतान समय पर करे और किसानों की मेहनत का सही मूल्य दिलाने की दिशा में ठोस कदम उठाए। तभी जाकर जिले के किसानों की महीनों की मेहनत सही अर्थों में रंग लाएगी और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। मंडी परिसर में लंबे इंतजार के दौरान किसान अक्सर अपने मोबाइल पर खेल समाचार भी पढ़ते रहते हैं, ताकि समय किसी तरह कट जाए।