नौगढ़ पीएचसी में डॉक्टर न मिलने से मरीजों की बढ़ी परेशानी
सिद्धार्थनगर जिले के नौगढ़ क्षेत्र में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर चिकित्सक की गैरमौजूदगी के कारण पहुंचे मरीजों और उनके परिजनों को निराश होकर लौटना पड़ा। ग्रामीण इलाकों से इलाज की उम्मीद लेकर आए लोगों को जांच, परामर्श और दवा के लिए काफी देर तक इंतजार करना पड़ा, लेकिन डॉक्टर के उपलब्ध नहीं होने से स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित रहीं।
मरीजों का कहना है कि सरकारी अस्पताल उनके लिए सबसे सुलभ और कम खर्च वाला उपचार केंद्र है। निजी क्लीनिक में फीस और दवाओं का खर्च उठाना हर परिवार के लिए संभव नहीं होता। ऐसे में पीएचसी पर चिकित्सक न मिलना गरीब, बुजुर्ग, महिलाओं और छोटे बच्चों के साथ आए परिवारों के लिए बड़ी परेशानी बन गया।
स्थानीय लोगों ने स्वास्थ्य विभाग से अस्पताल में डॉक्टर की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित करने, ओपीडी का समय सार्वजनिक करने और अनुपस्थित रहने की स्थिति में वैकल्पिक व्यवस्था बनाने की मांग की है। ग्रामीण क्षेत्र की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ी ऐसी खबरें स्थानीय समाचार मंच पर भी लगातार सामने आती रही हैं, जिससे आम लोगों की समस्याओं और विभागीय जवाबदेही पर ध्यान जाता है।
मरीजों को घंटों इंतजार के बाद लौटना पड़ा
नौगढ़ पीएचसी पर इलाज कराने पहुंचे कई मरीज सुबह अस्पताल खुलने के समय के आसपास पहुंच गए थे। कुछ लोग बुखार, शरीर में दर्द, सांस लेने में परेशानी और पेट संबंधी शिकायत लेकर आए थे, जबकि कई मरीज नियमित जांच या पुरानी बीमारी की दवा लेने पहुंचे थे। अस्पताल परिसर में मौजूद लोगों को उम्मीद थी कि ओपीडी शुरू होने के बाद उनकी समस्या का समाधान हो जाएगा।
समय बीतने के साथ मरीजों और तीमारदारों की बेचैनी बढ़ती गई। पंजीकरण या प्राथमिक स्तर की औपचारिकता पूरी होने के बाद भी चिकित्सकीय परामर्श नहीं मिल सका। कुछ लोगों ने कर्मचारियों से डॉक्टर के आने के बारे में जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन स्पष्ट समय नहीं मिलने के कारण उन्हें लंबे इंतजार के बाद वापस जाना पड़ा।
ग्रामीणों के मुताबिक दूर-दराज के गांवों से अस्पताल पहुंचने में ही काफी समय और किराया खर्च होता है। लौटने के बाद दोबारा आने का मतलब अतिरिक्त आर्थिक बोझ और काम का नुकसान है। गंभीर लक्षण वाले मरीजों के परिजनों को मजबूरी में निजी चिकित्सक या जिला अस्पताल का रुख करना पड़ सकता है, जिससे उपचार में देरी का खतरा भी बढ़ जाता है।
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र पर बढ़ता दबाव
नौगढ़ और आसपास के गांवों की बड़ी आबादी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर निर्भर है। सामान्य बुखार, संक्रमण, मौसमी बीमारियों, चोट, गर्भावस्था से जुड़ी शुरुआती जांच और बच्चों की स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के लिए ग्रामीण पहले सरकारी केंद्र को प्राथमिकता देते हैं। पीएचसी पर डॉक्टर, फार्मासिस्ट और जांच सुविधा उपलब्ध हो तो लोगों को दूर स्थित बड़े अस्पताल तक जाने की जरूरत कम पड़ती है।
किसी एक चिकित्सक की अनुपस्थिति का असर पूरे केंद्र की सेवा व्यवस्था पर दिखाई देता है। स्वास्थ्यकर्मी मरीजों का पंजीकरण कर सकते हैं, दवा वितरण कर सकते हैं या प्राथमिक जानकारी दे सकते हैं, लेकिन बीमारी की जांच, उपचार की सलाह और गंभीर स्थिति की पहचान डॉक्टर के बिना कठिन हो जाती है। इससे मरीजों को यह भरोसा नहीं रहता कि अस्पताल पहुंचने पर उन्हें आवश्यक सेवा मिल सकेगी।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि नियमित ओपीडी के साथ आपात स्थिति के लिए भी स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए। अस्पताल के बाहर ड्यूटी रोस्टर, डॉक्टर की उपलब्धता और रेफरल केंद्र की जानकारी प्रदर्शित करने से भ्रम कम हो सकता है। मरीजों को यह पता होना चाहिए कि किस समय किस चिकित्सक से परामर्श मिलेगा और डॉक्टर के अवकाश या क्षेत्रीय दौरे की स्थिति में किस अधिकारी से संपर्क किया जा सकता है।
जवाबदेही और सूचना व्यवस्था की जरूरत
सरकारी स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर की उपस्थिति केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि मरीजों के उपचार और सुरक्षा से जुड़ा विषय है। विभागीय स्तर पर उपस्थिति रजिस्टर, बायोमेट्रिक रिकॉर्ड और निरीक्षण व्यवस्था मौजूद होने के बावजूद यदि मरीजों को डॉक्टर नहीं मिलता, तो निगरानी तंत्र की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
स्वास्थ्य विभाग को ऐसे मामलों में मौके की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। डॉक्टर किस कारण से केंद्र पर मौजूद नहीं थे, क्या पूर्व अनुमति ली गई थी, अस्पताल में वैकल्पिक चिकित्सकीय व्यवस्था थी या नहीं और मरीजों को सूचना किस माध्यम से दी गई—इन बिंदुओं की समीक्षा जरूरी है। जांच के बाद जिम्मेदारी तय होने पर ही भविष्य में ऐसी परेशानी को रोका जा सकेगा।
अस्पताल प्रशासन को शिकायत दर्ज करने के लिए रजिस्टर, हेल्पलाइन नंबर और प्रभारी अधिकारी का नाम सार्वजनिक करना चाहिए। मरीजों की शिकायतों को केवल कागजी प्रक्रिया तक सीमित रखने के बजाय उनके निस्तारण की समयसीमा भी तय होनी चाहिए। डिजिटल सूचना बोर्ड, स्थानीय पंचायतों और आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से ओपीडी में बदलाव की जानकारी ग्रामीणों तक पहले पहुंचाई जा सकती है।
इलाज में देरी से बढ़ सकता है जोखिम
सामान्य दिखने वाली कई बीमारियां समय पर जांच न होने पर गंभीर रूप ले सकती हैं। तेज बुखार, सांस लेने में कठिनाई, लगातार उल्टी, रक्तचाप की समस्या या बच्चों में सुस्ती जैसे लक्षणों को नजरअंदाज करना जोखिम भरा हो सकता है। डॉक्टर की अनुपस्थिति में मरीजों को केवल अनुमान के आधार पर दवा लेने या बिना चिकित्सकीय सलाह के उपचार करने की मजबूरी हो सकती है।
गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों और पहले से मधुमेह, हृदय रोग या रक्तचाप जैसी बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए नियमित चिकित्सकीय निगरानी जरूरी होती है। ऐसे मरीजों को पीएचसी से लौटना पड़े तो उन्हें वैकल्पिक केंद्र तक पहुंचाने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। अगर रेफरल की प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होगी, तो परिवार अपनी क्षमता के अनुसार अलग-अलग जगहों पर भटक सकते हैं।
नौगढ़ क्षेत्र में मौसमी संक्रमण और ग्रामीण जीवन से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के दौरान प्राथमिक केंद्रों की भूमिका और बढ़ जाती है। बरसात में जलभराव, दूषित पानी और मच्छरों के कारण बीमारी का प्रकोप बढ़ सकता है। डुमरियागंज में सड़क निर्माण के बाद जल निकासी से जुड़ी परेशानी पर प्रकाशित जल निकासी की स्थानीय रिपोर्ट जैसी घटनाएं भी बताती हैं कि स्थानीय परिस्थितियां स्वास्थ्य पर सीधा असर डालती हैं।
स्थायी सुधार के लिए जरूरी कदम
पीएचसी में चिकित्सक की नियमित उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विभाग को ड्यूटी रोस्टर का सख्ती से पालन कराना होगा। अवकाश, प्रशिक्षण या अन्य सरकारी कार्य के कारण डॉक्टर अनुपस्थित हों तो पहले से वैकल्पिक चिकित्सक की तैनाती की जानी चाहिए। इससे मरीजों को अस्पताल पहुंचने के बाद बिना उपचार लौटने की स्थिति का सामना नहीं करना पड़ेगा।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में टेलीमेडिसिन सुविधा भी उपयोगी हो सकती है। यदि किसी दिन विशेषज्ञ या तैनात चिकित्सक उपलब्ध नहीं हो पाता, तो प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी वीडियो परामर्श के माध्यम से मरीज को डॉक्टर से जोड़ सकते हैं। हालांकि यह व्यवस्था सामान्य ओपीडी का पूर्ण विकल्प नहीं है, फिर भी शुरुआती जांच, दवा संबंधी सलाह और गंभीर मरीजों की पहचान में मदद कर सकती है।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों और स्वास्थ्य निगरानी समितियों को भी अस्पताल की नियमित समीक्षा करनी चाहिए। महीने में एक बार मरीजों की शिकायत, दवा की उपलब्धता, जांच सुविधा, स्टाफ की उपस्थिति और रेफरल व्यवस्था की जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है। नौगढ़ के लोगों की अपेक्षा बहुत बड़ी नहीं है—वे चाहते हैं कि तय समय पर अस्पताल खुले, डॉक्टर मौजूद रहें और बीमारी की स्थिति में उन्हें सम्मानजनक तथा समय पर उपचार मिले।