सिद्धार्थनगर के राजकीय इंटर कॉलेज में बालिका शौचालय बंद होने से छात्राएं बेहाल
सिद्धार्थनगर जिले के एक प्रमुख राजकीय इंटर कॉलेज में बालिका शौचालय बंद पड़े होने से छात्राओं को गंभीर परेशानी झेलनी पड़ रही है। पिछले कई दिनों से इस महत्वपूर्ण सुविधा का उपयोग नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण स्कूल आने वाली लड़कियों को दैनिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, शौचालय में पाइपलाइन फूटने और नाली जाम होने की समस्या बताई जा रही है, लेकिन प्रशासन की ओर से अब तक कोई ठोस मरम्मत कार्य नहीं कराया गया है।
छात्राओं ने बताया कि वे पानी पीने से कतराती हैं ताकि उन्हें बार-बार शौचालय जाने की ज़रूरत न पड़े। कई बार तो वे घंटों तक कक्षा में बैठने को मजबूर होती हैं, जिससे उनकी पढ़ाई पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। यह मामला तब सामने आया जब अभिभावकों ने विद्यालय प्रबंधन से शिकायत की, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसी प्रकार की लापरवाही की खबरें कभी-कभी अन्य राज्यों से भी आती रहती हैं, जहाँ गुजरात की ताजा खबरों में भी सार्वजनिक सुविधाओं की स्थिति पर सवाल उठते रहे हैं।
समस्या की शुरुआत और छात्राओं की मजबूरी
कॉलेज परिसर में बना बालिका शौचालय पिछले एक महीने से अधिक समय से बंद पड़ा है। प्रारंभ में केवल नाली जाम होने की शिकायत थी, जिसे देखते हुए विद्यालय प्रबंधन ने शौचालय को अस्थायी रूप से बंद कर दिया। तब से लेकर आज तक न तो नाली की सफाई हुई है और न ही पाइपलाइन की मरम्मत की गई है। छात्राएं बताती हैं कि उन्हें अब घर से पानी भरकर लाना पड़ता है और कई बार पास के मकानों या दुकानों का सहारा लेना पड़ता है।
सुबह की पाली में पढ़ने वाली छात्राओं को सबसे अधिक कठिनाई होती है, क्योंकि लंबी दूरी से आने वाली लड़कियां पहले से थकी हुई होती हैं और उन्हें विश्राम की आवश्यकता होती है। शौचालय बंद होने के कारण वे न तो अपना चेहरा धो पाती हैं और न ही पानी पीने के बाद सहज महसूस कर पाती हैं। कई छात्राओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे कॉलेज आने से कतरा रही हैं और उनकी उपस्थिति दिन-ब-दिन घट रही है। यह स्थिति दर्शाती है कि बुनियादी सुविधाओं की कमी शिक्षा के अधिकार को सीधे तौर पर प्रभावित कर रही है।
विद्यालय की प्रधानाचार्य से इस संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि मामले की जानकारी उच्च अधिकारियों को दे दी गई है और जल्द ही समाधान करा लिया जाएगा। हालांकि, तीन सप्ताह बीत जाने के बाद भी कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाई है, जिससे छात्राओं का विश्वास प्रशासन से उठता नज़र आ रहा है।
स्वास्थ्य पर पड़ता असर
शौचालय सुविधा न मिलने का सीधा असर छात्राओं के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। स्वच्छता की कमी के कारण त्वचा संबंधी समस्याएं, पेशाब में संक्रमण और पेट दर्द जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्र की पृष्ठभूमि से आने वाली अधिकांश छात्राएं पहले से कुपोषण का शिकार होती हैं, ऐसे में उन्हें और अधिक परेशानी झेलनी पड़ रही है।
चिकित्सकों के अनुसार, किशोरियों में स्वच्छता संबंधी सुविधाओं की अनुपलब्धता गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती है। लंबे समय तक पानी कम पीने से डिहाइड्रेशन और किडनी पर भी विपरीत प्रभाव पड़ता है। विद्यालय स्तर पर ही बच्चियों को स्वच्छता के प्रति जागरूक किया जाता है, लेकिन जब सुविधा ही उपलब्ध न हो तो यह संदेश खोखला नज़र आता है।
स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं ने भी चिंता जताई है कि ऐसी स्थिति में छात्राएं संक्रमण की चपेट में आ सकती हैं। उन्होंने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग को भी आगे आना चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की महामारी जैसी स्थिति से बचा जा सके।
शिक्षा विभाग की भूमिका पर उठते सवाल
राजकीय इंटर कॉलेजों में बुनियादी सुविधाओं की देखरेख शिक्षा विभाग की ज़िम्मेदारी होती है, लेकिन इस मामले में विभाग की उदासीनता स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है। शौचालय बंद होने की शिकायत कई बार की जा चुकी है, फिर भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विभागीय अधिकारी समय-समय पर विद्यालयों का निरीक्षण क्यों नहीं करते।
जिले में संचालित अधिकांश राजकीय विद्यालयों में शौचालयों की स्थिति बहुत खराब है। कई जगह पानी की व्यवस्था नहीं है, तो कहीं दरवाजे टूटे हुए हैं। इन समस्याओं की ओर ध्यान न देने से ये विद्यालय धीरे-धीरे अभिभावकों के विश्वास से बाहर होते जा रहे हैं। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो नामांकन में भारी गिरावट देखी जा सकती है।
हाल ही में सामने आई एक अन्य रिपोर्ट में आवास योजना में ठगी जैसी घटनाएं भी प्रकाश में आई हैं, जो दर्शाती हैं कि जनता के प्रति शासन की प्रतिबद्धता में कमी आ रही है। ऐसी घटनाओं से आम जनता में सरकारी योजनाओं और विभागों के प्रति असंतोष बढ़ रहा है।
अभिभावकों में बढ़ती नाराज़गी
जब शौचालय बंद होने की बात अभिभावकों तक पहुंची, तो उनमें काफी रोष देखा गया। कई अभिभावकों ने विद्यालय प्रबंधन से सीधे तौर पर इस मामले पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्हें हर बार टालमटोल जैसे जवाब मिले। माताओं का कहना है कि वे अपनी बेटियों को ऐसी परिस्थितियों में भेजकर स्वयं असहज महसूस करती हैं।
कुछ अभिभावकों ने यहां तक कहा कि वे अपनी बेटियों को पास के निजी विद्यालय में दाखिला दिलाने का विचार कर रहे हैं, भले ही आर्थिक भार अधिक हो। उनका मानना गया कि बेटी की सुरक्षा और गरिमा किसी भी फीस से अधिक महत्वपूर्ण है। यह स्थिति राजकीय विद्यालयों के प्रति जनता के विश्वास को गंभीर नुकसान पहुंचा रही है।
अभिभावक संघ ने भी इस मुद्दे को लेकर जिलाधिकारी से मिलने का समय माँगा है और जल्द समाधान न होने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। उनकी मांग है कि शौचालय की मरम्मत के साथ-साथ विद्यालय की अन्य बुनियादी सुविधाओं का भी जायज़ा लिया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी समस्याओं की पुनरावृत्ति न हो।
जिला प्रशासन की प्रतिक्रिया और आगे की राह
जिला प्रशासन ने मामले की जानकारी मिलने पर त्वरित जांच के आदेश दिए हैं। जिलाधिकारी कार्यालय की ओर से कहा गया है कि एक-दो दिनों में शौचालय की मरम्मत का कार्य आरंभ कर दिया जाएगा। साथ ही संबंधित ठेकेदार की जाँच भी कराई जा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि देरी का वास्तविक कारण क्या है।
प्रशासन का कहना है कि शासन की मंशा के अनुरूप सभी विद्यालयों में बेहतर सुविधाएं सुनिश्चित कराई जाएंगी। इसके लिए जिला स्तर पर एक समिति गठित करने की योजना है, जो नियमित अंतराल पर विद्यालयों का दौरा करेगी और समस्याओं का त्वरित निराकरण करेगी। अधिकारियों ने छात्राओं और अभिभावकों से धैर्य रखने की अपील की है।
हालांकि, इन आश्वासनों पर तब तक विश्वास करना कठिन है, जब तक धरातल पर ठोस कार्रवाई न दिखाई दे। यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि विकास की योजनाओं का लाभ तभी सही मायने में जनता तक पहुंचता है, जब प्रशासनिक तंत्र जन-समस्याओं के प्रति संवेदनशील हो।
स्वच्छ भारत अभियान के लक्ष्यों पर प्रश्नचिह्न
केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित स्वच्छ भारत अभियान का मुख्य उद्देश्य हर विद्यालय में स्वच्छ शौचालय सुविधा सुनिश्चित करना है। लेकिन सिद्धार्थनगर के इस राजकीय इंटर कॉलेज की स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि अभियान के प्रचारात्मक पक्ष पर ही अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जबकि ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और ही बयान करती है।
विद्यालय परिसर में बने शौचालय अगर सप्ताहों तक बंद रह सकते हैं, तो यह साफ़ संकेत है कि निगरानी तंत्र में कमी है। ऐसी स्थिति में सिर्फ एक विद्यालय की बात नहीं है, बल्कि पूरे ज़िले के राजकीय विद्यालयों में बुनियादी ढांचे की समीक्षा करने की आवश्यकता है। बिना किसी ठोस योजना के सरकारी धन का आवंटन करना भी उचित नहीं कहा जा सकता।
छात्राओं के अधिकारों की रक्षा के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आना होगा। मीडिया, नागरिक समाज संगठन और स्थानीय जनप्रतिनिधि मिलकर प्रशासन पर दबाव बना सकते हैं, ताकि ऐसी समस्याओं का समाधान समयबद्ध तरीके से हो और छात्राएं गरिमापूर्ण वातावरण में शिक्षा ग्रहण कर सकें।