शोहरतगढ़ में किसान सभा, एमएसपी और खेती से जुड़े मुद्दों पर चर्चा
सिद्धार्थनगर जिले के शोहरतगढ़ क्षेत्र में किसानों की बैठक के दौरान न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की मांग प्रमुखता से उठाई गई। किसान सभा से जुड़े प्रतिनिधियों ने कहा कि खेती की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने से ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ता जा रहा है। बैठक में धान, गेहूं, गन्ना और दलहन समेत स्थानीय स्तर पर उगाई जाने वाली फसलों की खरीद व्यवस्था पर भी चर्चा हुई।
किसानों ने प्रशासन और सरकार से मांग की कि घोषित समर्थन मूल्य पर प्रभावी खरीद सुनिश्चित की जाए, मंडियों में बिचौलियों की भूमिका घटे और भुगतान समय पर हो। पूर्वांचल के सीमावर्ती जिले सिद्धार्थनगर में कृषि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है, इसलिए फसल मूल्य, सिंचाई, खाद-बीज और बाजार तक पहुंच से जुड़े सवाल सीधे हजारों परिवारों के जीवन से जुड़े हैं।
किसान सभा में एमएसपी की मांग प्रमुख
बैठक में वक्ताओं ने कहा कि न्यूनतम समर्थन मूल्य केवल सरकारी घोषणा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। किसानों को अपनी उपज बेचते समय यह भरोसा होना जरूरी है कि बाजार भाव गिरने पर भी उन्हें निर्धारित मूल्य से कम भुगतान नहीं किया जाएगा। इसके लिए सरकारी खरीद केंद्रों की संख्या, संचालन अवधि और खरीद प्रक्रिया को स्पष्ट एवं पारदर्शी बनाने की जरूरत बताई गई।
किसान प्रतिनिधियों के अनुसार, कई बार स्थानीय बाजार में उपज की कीमत घोषित एमएसपी से नीचे चली जाती है। छोटे और सीमांत किसान भंडारण की सुविधा न होने के कारण फसल को लंबे समय तक रोक नहीं पाते और तत्काल जरूरतों के चलते कम दाम पर बिक्री कर देते हैं। सभा में इसी समस्या का स्थायी समाधान निकालने की मांग रखी गई।
बैठक में यह भी कहा गया कि समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए पंजीकरण, सत्यापन, तौल और भुगतान की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए। किसानों को सरकारी योजनाओं और खरीद नियमों की जानकारी गांव स्तर पर उपलब्ध कराने के लिए शिविर लगाने का सुझाव भी सामने आया।
लागत बढ़ने से खेती पर बढ़ा दबाव
किसानों ने बताया कि डीजल, बिजली, खाद, बीज, कीटनाशक और मजदूरी की लागत में बढ़ोतरी का सीधा असर खेती की लाभप्रदता पर पड़ रहा है। मौसम की अनिश्चितता के कारण कभी सूखा, कभी तेज बारिश और कभी रोग-कीट का प्रकोप उत्पादन को प्रभावित कर देता है। ऐसी स्थिति में बाजार मूल्य कम होने पर किसान को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है।
सिद्धार्थनगर के ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में किसान छोटे जोत वाले हैं। सीमित भूमि पर परिवार की जरूरतें पूरी करने के साथ-साथ कृषि निवेश जुटाना उनके लिए कठिन होता है। सभा में वक्ताओं ने कहा कि फसल की लागत तय करते समय बीज, सिंचाई और मजदूरी के साथ किसान परिवार के श्रम को भी उचित महत्व दिया जाना चाहिए।
खेती से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए फसल बीमा, मुआवजा और मौसम आधारित सलाह को प्रभावी बनाने पर भी जोर दिया गया। किसानों का कहना था कि बीमा योजना का लाभ तभी उपयोगी होगा, जब नुकसान का आकलन समय पर हो और भुगतान में अनावश्यक देरी न हो।
सरकारी खरीद केंद्रों की व्यवस्था पर सवाल
किसान सभा में सरकारी क्रय केंद्रों की कार्यप्रणाली का मुद्दा भी उठाया गया। किसानों ने कहा कि केंद्रों पर तौल, नमी जांच, बोरी उपलब्धता और दस्तावेजों से जुड़ी प्रक्रिया स्पष्ट नहीं होने पर उन्हें कई बार परेशानी होती है। दूरदराज के गांवों से उपज लाने में परिवहन खर्च बढ़ता है और केंद्र पर लंबी प्रतीक्षा से अतिरिक्त समय और श्रम लगता है।
प्रतिनिधियों ने मांग की कि खरीद केंद्रों की जानकारी गांवों में पहले से प्रचारित की जाए। केंद्र का स्थान, समय, आवश्यक कागजात, गुणवत्ता मानक और भुगतान की समयसीमा सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित होनी चाहिए। खरीद प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की कटौती या अनधिकृत शुल्क पर सख्ती से रोक लगाने की बात भी कही गई।
स्थानीय प्रशासन की निगरानी मजबूत होने से किसानों का भरोसा बढ़ सकता है। उत्तर प्रदेश की खबरें पढ़ने वाले क्षेत्रीय पाठकों के लिए भी कृषि खरीद, मंडी व्यवस्था और प्रशासनिक कार्रवाई से जुड़ी जानकारी उपयोगी रहती है, क्योंकि इन मुद्दों का प्रभाव गांव-गांव तक दिखाई देता है।
धान और गेहूं किसानों की विशेष चिंता
शोहरतगढ़ क्षेत्र में धान और गेहूं की खेती बड़े पैमाने पर होती है। धान की कटाई के बाद किसान को तत्काल नकदी की जरूरत रहती है, जबकि सरकारी खरीद में देरी या स्थानीय बाजार में कम भाव मिलने पर वह अपनी उपज औने-पौने दाम में बेचने को मजबूर हो सकता है। सभा में धान खरीद केंद्रों पर नमी मानक और तौल की प्रक्रिया को किसान हितैषी बनाने की मांग की गई।
गेहूं किसानों ने भी समय पर खरीद और भुगतान का मुद्दा उठाया। किसानों का कहना था कि उत्पादन लागत का अनुमान लगाना कठिन होता जा रहा है। सिंचाई के लिए डीजल या निजी साधनों पर निर्भर किसानों का खर्च और बढ़ जाता है। यदि मंडी भाव में उतार-चढ़ाव हो, तो घोषित समर्थन मूल्य का वास्तविक लाभ सीमित हो जाता है।
दलहन और तिलहन की खेती को प्रोत्साहित करने की जरूरत पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि फसल विविधीकरण से मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने, पानी की बचत और किसानों की आय के नए स्रोत तैयार करने में मदद मिल सकती है। इसके लिए बीज, तकनीकी सलाह और खरीद की निश्चित व्यवस्था जरूरी है।
सिंचाई, खाद और बीज की उपलब्धता
किसानों ने नहरों की सफाई, राजकीय नलकूपों की मरम्मत और ग्रामीण बिजली आपूर्ति में सुधार की मांग रखी। समय पर पानी नहीं मिलने से बुआई और सिंचाई का चक्र प्रभावित होता है। कई गांवों में किसान निजी पंप या डीजल इंजन पर निर्भर रहते हैं, जिससे लागत बढ़ जाती है और छोटे किसानों की मुश्किलें गहरी होती हैं।
बैठक में खाद और प्रमाणित बीज की उपलब्धता को लेकर भी चिंता जताई गई। सीजन के समय मांग बढ़ने पर किसानों को लंबी कतारों का सामना करना पड़ता है या उन्हें अधिक कीमत पर सामग्री खरीदनी पड़ती है। किसान प्रतिनिधियों ने सुझाव दिया कि सहकारी समितियों और अधिकृत विक्रेताओं पर स्टॉक की नियमित निगरानी हो तथा कालाबाजारी के मामलों में तुरंत कार्रवाई की जाए।
कृषि विभाग की ओर से गांवों में प्रशिक्षण और सलाह शिविर आयोजित किए जाने की आवश्यकता बताई गई। मिट्टी जांच, संतुलित खाद उपयोग, जैविक उपाय और आधुनिक कृषि यंत्रों की जानकारी किसानों को स्थानीय भाषा में दी जाए तो उत्पादन लागत कम करने में सहायता मिल सकती है।
स्थानीय बाजार और भुगतान की समस्या
सभा में किसानों ने कहा कि उपज बेचने के बाद समय पर भुगतान न मिलना उनकी सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्याओं में शामिल है। छोटे किसान अक्सर फसल बिक्री की रकम से कर्ज चुकाते हैं, अगली फसल का बीज खरीदते हैं और घरेलू खर्च चलाते हैं। भुगतान में देरी होने पर उन्हें निजी उधार लेना पड़ता है, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ जाता है।
कृषि उपज मंडियों में पारदर्शी बोली, सही तौल और रसीद उपलब्ध कराने की मांग रखी गई। किसानों का कहना था कि उन्हें अपनी उपज के बाजार भाव की जानकारी मोबाइल संदेश, पंचायत सूचना पट और स्थानीय कृषि केंद्रों के माध्यम से मिलनी चाहिए। इससे वे अलग-अलग खरीददारों के प्रस्ताव की तुलना कर सकेंगे और जल्दबाजी में बिक्री से बचेंगे।
किसानों ने भंडारण और परिवहन की सुविधा बढ़ाने पर भी जोर दिया। गांवों के पास छोटे गोदाम, कोल्ड स्टोरेज और सामुदायिक भंडारण केंद्र विकसित किए जाएं तो किसान फसल को सुरक्षित रखकर बेहतर समय पर बेच सकते हैं। खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से संबंधित व्यापक रिपोर्टों के लिए कृषि समाचार कवरेज जैसे समाचार स्रोतों पर प्रकाशित सामग्री भी पाठकों को राज्य और देश के स्तर पर चल रही नीतिगत बहस से जोड़ती है।
प्रशासन से संवाद और आगे की रणनीति
किसान सभा में तय किया गया कि एमएसपी, सरकारी खरीद और स्थानीय कृषि समस्याओं से संबंधित मांगों को ज्ञापन के माध्यम से प्रशासन तक पहुंचाया जाएगा। प्रतिनिधियों ने कहा कि किसानों की समस्याओं का समाधान केवल बैठकों तक सीमित न रहकर विभागीय स्तर पर समयबद्ध कार्रवाई के रूप में दिखाई देना चाहिए। खरीद सत्र से पहले अधिकारियों, किसान संगठनों और सहकारी संस्थाओं के बीच समन्वय बैठक कराने की मांग भी सामने आई।
वक्ताओं ने किसानों से संगठित होकर अपनी समस्याएं दर्ज कराने और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की अपील की। उन्होंने कहा कि अलग-अलग गांवों से आने वाली शिकायतों को एकत्र कर प्राथमिकता के आधार पर प्रशासन के सामने रखा जाएगा। कृषि विभाग, मंडी समिति और राजस्व अधिकारियों के साथ नियमित संवाद से शिकायतों के निस्तारण की प्रक्रिया तेज हो सकती है।
शोहरतगढ़ की बैठक ने यह संकेत दिया कि किसानों की चिंता केवल फसल के दाम तक सीमित नहीं है। लागत, सिंचाई, खरीद केंद्र, भुगतान, भंडारण और बाजार की जानकारी सभी मुद्दे एक-दूसरे से जुड़े हैं। एमएसपी को प्रभावी बनाने के साथ इन व्यवस्थाओं में सुधार किया जाए, तभी खेती को स्थायी और लाभकारी बनाने की दिशा में ठोस परिणाम सामने आ सकेंगे।