राप्ती नदी की रेत पर खेती करने वाले किसानों की चिंता बढ़ी

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बांसी l अप्रैल माह में मौसम में आए बदलाव व गर्म हवाओं ने मौसमी फल तथा सब्जियों में आग लगा दिया है l इससे खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज, लौकी, तरोई, करेला सहित सभी सब्जियों की रंगत उड़ रही है l इसको लेकर राप्ती नदी की रेत पर खेती करने वाले भूमिहीन किसानों की चिंता बढ़ गई है इन्हें तो प्राकृत की दोहरी मार झेलना पड़ रहा है l राप्ती नदी के रेत पर किसानों की फसल जैसे ही तैयार हुई उसी बीच नदी में पहाड़ी पानी आ जाने से इनकी आधी फसल पानी में डूबने से बर्बाद हो गई जो बची थी उसपर मौसम की मार पड़ रही है l माना जा रहा है कि मौसम के मार से 25 से 30 प्रतिशत फसल बर्बाद हो रही है l क्योंकि अब गर्म हवाएं फूल को फल में तब्दील होने से पहलेसुखला दे रही है l और इनकी हरियाली समाप्त हो पौधा पीला पड़ने लगा है lतहसील क्षेत्र से गुजरने वाली राप्ती नदी के दोनों तट पर सैकड़ो एकड़ रेत पर क्षेत्र के भूमिहीन किसान खीरा, ककड़ी, तरबूज, खरबूज, लौकी, तरोई व करेला आदि की खेती कर अच्छी कमाई कर लेते है इससे इनके परिजनों का जीवकोपार्जन होता है l पंद्रह दिन पहले तक रेत फलो व सब्जियों के सुगंध से पूरे वातावरण को सुगन्धित किये हुए था इधर तेजी से बढ़ी तपिश और गर्म हवाओं ने इनकी रौनक छीन ली है l जानकारों का मानना है कि इन खेतो में नमी कम होने से परागण नहीं हो पा रहा है और यह मौसम सब्जियों के लिए खतरनाक साबित हो रहा है l किसान दयाराम का कहना है कि की उनकी फसल को पहले पहाड़ी ढल यानि पहाड़ी पानी ने बर्बाद कर दिया जो बचा था वह गर्म हवाओं से बर्बाद हो रहा है काफी जतन करने के बाद भी वह अपने खून पसीने की कमाई को नहीं बचा पा रहे है l किसान सुनील का कहना है कि रेत पर की गई खेती से उनके परिवार का कई महीने का खर्च चलता था, इस बार पूजी भी निकलना मुश्किल हो गया है l इनका कहना है कि बड़े ही मेहनत व लगन से खेती किया गया था उम्मीद थी कि चार पैसा बच जायेगा परन्तु अरमानो पर पानी फिर गया lकिसान कल्लू,सुहेल, नजीर व सलीम ,कामता का कहना है कि वह भूमिहीन किसान है और हर वर्ष राप्ती नदी के रेत पर किसानी कर अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं लेकिन इस बार पहले पहाड़ी पानी और अब मौसम ने उनकी कमर तोड़ दिया है l इनका कहना है कि जीतोड़ मेहनत कर फसल को तैयार किया था जब फल खाने का समय आया तो सब बर्बाद हो गया l

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